Sunday, February 20, 2011

अपने हिस्से की देशभक्ति - २

  1. पिछली पोस्ट से आगे ...

    देश भक्ति दिखनी भी चाहिए :-
    मैंने कई बार देखा है (और देखा क्या है मैं खुद भी कुछ हद तक इसी में शामिल हूँ) युवा अगर पार्टी में जाते हैं तो डीजे पर बज रहे फ़िल्मी गाने को जोर जोर से गाने में नहीं हिचकते लेकिन वही युवा अगर किसी धर्म संस्कृति के काम जैसे भजन कीर्तन या जागरण में हो यहाँ तक की कुछ तो अपने घर में ही हो रहे कथा-हवन में हिस्सा लेने में कतराते हैं या फिर किसी सामाजिक मुद्दे को लेकर मार्च, जुलूस या प्रदर्शन हो तो वहाँ नारे लगना स्वाभाविक है अगर आप कीर्तन या जागरण में है तो 'जय माता दी' भगवान् शिव या राम और कुछ भी जयघोष या आप किसी मार्च, जुलूस या प्रदर्शन में है तो 'वन्दे मातरम' या भारत 'माता कि जय' या कुछ और तो युवा या तो इनमे हिस्सा ही नहीं लेते और भगवान कि दया से ले भी लिया तो अपनी बातों में मशगूल रहेंगे पर नारे नहीं लगायेंगे ना जाने क्यों शर्म आती है मेरा ऐसा मानना है की जब आप शामिल हो ही गए है तो मन से नारे या जयघोष लगायें. और मैं शादी या किसी भी कार्यक्रम में फ़िल्मी गाने गाने के लिए मन नहीं कर रहा हूँ.

    इम्पोर्टेड है तो बढ़िया है वाली मानसिकता :-

    आज लोगों के दिल में ये बात घर कर गयी है कि बाहर बनने वाली हर चीज अच्छी होती है चाहे फिर वो कुछ भी हो हर छोटी से छोटी चीज़ इम्पोर्टेड ही चाहिए जैसे कपडे, साबुन, दंतमंजन, मोटर साईकल, कार, घड़ी या और कुछ भी, हम कुछ भी स्वदेशी इस्तेमाल करना ही नहीं चाहते. हमें घर में आने वाली हर छोटी चीज़ विदेशी चाहिए चाहे वो कुछ भी हो, कुछ चीज़ों को छोड़ दें तो बाज़ार में स्वदेशी और अच्छी चीज़ें आराम से मिल जाती हैं और मैं तो कहूँगा की अगर इसके लिए कुछ पैसे ज्यादा खर्च करने हो तो करेंगे, लेकिन ऐसा कम ही होता है कि स्वदेशी चीज़े महंगी हो.
    एक उदाहरण है :- आज कोलगेट के विज्ञापन में जो दिखाया जा रहा है ‘कि क्या आपके पेस्ट में नमक है ?’ कोई जाकर इन्हें ये बताये की भारत के सबसे पिछड़े गाँव में जहाँ स्कूल भी नहीं होगा वहां भी लोग यह बात बता देंगे की नमक से दांत साफ़ करना कितना लाभकारी है और जितने भी लोग ये पढ़ रहे हैं उन्होंने अपने गाँव में या यहीं शहर में दांत में दर्द होने पर माँ या पिताजी के कहने पर हल्दी नमक को मिला कर दांतों पर रगड़ा होगा और ये बात आज हमें कोलगेट वाले बताएँगे. और मजेदार तो ये है की लोगों ने उनकी बात मान खरीद भी लिया, लेकिन अपने घर वालों कि बात मान कभी नमक या राख से दांत साफ़ नहीं किये होंगे ये हमारी ही कमी है कि विदेशी है इम्पोर्टेड है तो बेहतर है.

    पढ़ाई के लिए या पढ़ाई के बाद विदेश :-
    आज कल ना जाने कहाँ से ये सोच विकसित हो गयी है कि भारत में अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कि जा सकती और युवा विद्यार्थी विदेशों का रुख करने लगे हैं मुझे इससे ज्यादा दिक्कत तब होती है जब आप पढने गए और वही के हो के रह गए. और वहां जा कर कहते हैं कि भारत रहने लायक जगह नहीं है वहां दकियानूसी और रूढ़ीवादी विचार वाले लोग रहते हैं, मन तो करता है गोली मार दूँ ऐसे लोगो को. लेकिन इससे भी ज्यादा गुस्सा तब आता है जब अपने ही देश के कुछ विद्यार्थी यहीं से शिक्षा प्राप्त कर प्लेसमेंट में विदेशी कम्पनियों से मिले बड़े पैकेज पर इतराते हुए विदेश भाग जाते हैं और कहते हैं भारत कभी तरक्की नहीं कर सकता. भारत ने आपको इतना बड़ा बनाया कि आपकी मांग विदेशों में भी है. और आपने भारत को ही लात मार दी क्यों आपने यह जिम्मा अपने सर नहीं लिया कि कुछ दिन कम पैसों में काम करेंगे पर देश में रहकर देश के लिए ही काम करेंगे, देश कि तरक्की के लिए काम करेंगे . मैं तो चाहता हूँ कि कानून बना देना चाहिए उच्च शिक्षा लेने के बाद कम से कम 7 या 10 साल आप कहीं बाहर काम नहीं कर सकते. आपको अपने ही देश में काम करने होगा आपको अच्छा पैसा भी मिलेगा ऐसा नहीं है कि मुफ्त में आपको घसीटा जायेगा. लेकिन ये बहुत मुश्किल है.

    ये सभी बातें कुछ लोगों को अजीब लगेंगी लेकिन ये सच है आप बिना बोर्डर पर जाये भी इसी तरह के कुछ और काम कर अपनी देशभक्ति दिखा सकते हैं बस कुछ बातों का ध्यान रखना होगा और बस हो गया. शाहरुख़ खान अभिनीत चक दे इंडिया का ये डायलोग आज भी मुझे याद है कि मैदान में खेलते समय पहले देश के लिए खेलो फिर अपनी टीम के लिए और अगर फिर भी कुछ जान बच जाए तो अपने लिए, उसी तरह मैं मानता हूँ कि हम पढ़ाई देश के लिए करते हैं फिर समाज के लिए और फिर अपने परिवार के लिए.
    बाकी रही बोर्डर पर लड़ने कि बात तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए. अमेरिका में २ साल की आर्मी ट्रेनिंग अनिवार्य है क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता??, लेकिन एक बार एम टीवी पर एक पोल हुआ था कि क्या अमेरिका की तरह यहाँ भी ट्रेनिंग को अनिवार्य नहीं किया जा सकता?? तो सिर्फ ५२% लोगों का जवाब हां था जबकि एम टीवी एक युवा फेम चैनल है इसी पर कवि हरिओम पवार कि पंक्तियाँ कुछ यूँ हैं :-


    क्या ये देश उन्ही का है जो युद्धों में मर जाते हैं,
    अपना शीश कटा कर के सरहद को पार कर जाते हैं,
    ऐसा युद्ध वतन कि खातिर सबको लड़ना पड़ता है,
    संकट कि घड़ियों में सबको सैनिक बनना पड़ता है,
    ये गाथा, उनको सूरज कि लाली में रख देती है,
    और हाड़ा रानी शीश काट कर थाली में रख देती है

Wednesday, February 9, 2011

अपने हिस्से क़ी देशभक्ति

देश भक्ति क्या है ? आखिर कौन होता है देशभक्त ? लोग कहतें हैं की फौजी देशभक्त होते हैं इसमें कोई शक भी नहीं है की घर से दूर अपनी जान को जोखिम में डाल देश की सीमाओं और हमारी रक्षा करने वाला एक फौजी देश भक्त होता है और ऐसा भी नहीं है की उसे कुछ बहुत ज्यादा तनख्वाह या वेतन मिलता हो महीनों की हाड़ तुडाने वाली ट्रेनिंग और जोखिम भरी नौकरी के बाद भी एक फौजी को लग-भग कॉल सेंटर में १२ पास कर नौकरी करने वाले के बराबर ही वेतन मिलता है. कुछ अपवाद हो सकते हैं पर फिर भी कुल मिला कर हम शुद्ध रूप से एक सैनिक एक फौजी को देश भक्त कह सकते हैं.
लेकिन क्या सिर्फ फौजियों के देश भक्त होने से काम चल जायेगा, हमारा कोई फ़र्ज़ नहीं देश के प्रति रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता परशुराम की प्रतीक्षा में कहा है की

'‘हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?’'

मैं राम धरी सिंह दिनकर की इस भावना को जीने की बात कर रहा हूँ. तो देश भक्त होने के लिए आपको जो सबसे पहले होना चाहिए वो है ईमानदार. आपको देश भक्त होने के लिए बोर्डर पर जाकर गोलियां चलने की जरूरत नहीं है देश भक्त होने के लिए आपको सिर्फ इतना करना होगा कि आप जो भी कार्य करें उसे इमानदारी से करें. आप जहाँ भी काम करते हैं बस उस काम को इमानदारी से करे. हमारे देश में सरकारी कर्मचारियों पर एक लांछन लगा है कि आपकी सरकारी नौकरी लग गयी है अब आप सरकारी दामाद हो गए. आप उतना काम नहीं करते जितना सरकार आपका ध्यान रखती है. सरकारी नौकरी करने वाले अक्सर ऐसा करते है :-
कार्यालय पहुँचाने पर उन्हें याद आता है कि उन्होंने बिजली का बिल जमा नहीं किया तो हाजिरी लगाने के बाद काम करने बजाये ऑफिस के समय में आप बिल भरते हैं.
कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों ये लोग अपना काम ईमानदारी से पूरे समय तक नहीं करते ? कई बार मैं अपने या घर के किसी काम से बैंक जाता हूँ तो देखता हूँ की बैंकिंग का समय तो ९:३० से शुरू होता है. लेकिन ९:३० बजे बैंककर्मी आते ही हैं जिससे सुबह ऑफिस जाने वालों को देर होती है ऐसा एक बार हो तो चलता है लेकिन एक तो ये रोज़ कि कहानी है दूसरा बैंक में लेट होने के कारण अन्य जगह काम करने वाले लेट होते हैं और फिर ये एक चैन बन जाती है. जो कि लेट लतीफी कि आदत डालती है

ईमानदारी का दूसरा पहलू भी है
१) क्या आप अपना आयकर सही जानकारी और सही समय पर भरते है?
२) क्या इसी प्रकार के अन्य कर भी जो देने जरूरी हैं उन्हें भरते हैं ?
३) क्या आप सड़क पर गाड़ी चलाते समय रेड लाईट के दिशा निर्देशों का पालन करते हैं?
४) क्या आप मोटर साईकल चलाते हुए हेलमेट का प्रयोग बिना पुलिस वाले रास्तों पर भी करते हो ?
५) क्या आप अपना फ़ोन, पानी, बिजली बिल समय पर भरते है ?
६) क्या आप पानी और बिजली का सही इस्तेमाल करते हैं ? आदि आदि

हम अपनी जिम्मेदारी को यह कह कर नहीं टाल सकते कि सरकार है वो करेगी. जहाँ लोग जागरूक नहीं होते वहां सरकारें भी लापरवाह होती हैं आज देश में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है उसके पीछे भी कुछ हद तक हमारा ही हाथ है पानी का बिल भरने गए और लाइन लम्बी मिली तो हमने १० रूपये देकर काम करा लिया या फिर बिना हेलमेट लगाये जा रहे हैं और पुलिस ने पकड़ लिया तो भी हम २० -५० देकर निकल जाते हैं लेकिन इससे हुआ ये की अब उन्हें आदत हो गयी वो बिना २०-५० लिए काम करते ही नहीं है. और अब तो १० से काम चलता ही नहीं है अब १० की जगह धीरे धीरे दाम भी बढ़ रहा है सिर्फ १० से गुजरा नहीं होता और काम के ५०, १००, ५०० तक लिए जाते हैं कहावत मशहूर है 'सरकारी ऑफिस में काम करना है तो चपरासी को पटा लो' काम जल्दी हो जाता है. इस भ्रष्टाचारी शासन पर दो लाइन राम धारी सिंह दिनकर जी कि :-

'जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,

अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।'

शेष अगली पोस्ट में