एक आदमी को खांसी हो जाती है तीन-चार दिनों तक ठीक नहीं होती तो वह आदमी जाता है डॉ. के पास
और दवाई ले आता है डॉ. कहता है इन्फेक्शन है इंजेक्शन लगाना पड़ेगा आदमी कहता है ठीक है डॉ.
इंजेक्शन लगा देता है और वह आदमी दो दिन में ठीक हो जाता है. सोचो अगर वह आदमी डॉ. के पास
नहीं जाता और इंजेक्शन नहीं लगवाता तो क्या होता...??? होता ये की वो खांसी धीरे-धीरे टीबी हो
जाती और फिर उस आदमी को है से था बना देती.
अब असल मुद्दे पर आते हैं जिसके लिए यह लेख लिखना शुरू किया था. अर्थात ये की अगर मैं बीजेपी द्वारा पेट्रोल
और दूध के दाम बढ़ाये जाने के विरोध में किये गए चक्का जाम को इंजेक्शन कहूँ तो गलत नहीं होगा. क्योंकि पिछले एक डेढ़ साल में जिस तरह से दूध और पेट्रोल के दाम बढ़े हैं वो चिंता का विषय है. सही बताऊँ तो दूध का तो कुछ ऐसा है की कुछ लोग अगर न भी पीएं तो चलता है लेकिन ऐसे भी लोग हैं जिन्हें बिना दूध पीये नींद ही नहीं आती, और साहब दूसरों का क्या कहूँ मुझे खुद भी नहीं आती. दूसरी और पेट्रोल है तो भैया इसकी माया तो ऐसी है की अगर ये महंगा होता है तो भैया निश्चित तौर पर खाने-पीने की हर चीज़ का महंगा होना तय है. क्योंकि पेट्रोल की वजह से आयात निर्यात, यातायात और आवाजाही के शुल्क में तेज़ी से वृद्धि होगी. जिसका असर फल-सब्जियों और आदि वस्तुओं पर पड़ना तय है और अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई का का ग्राफ ऊपर जाना निश्चित.
अब इन्ही पेट्रोल और दूध के दामों में हुई बढ़ोतरी को वापस लेने के लिए बीजेपी ने चक्का जाम किया, दिल्ली स्तर
के इस चक्का जाम में बीजेपी काफी हद तक सफल भी रही. और ये सब किया किसके लिए जनता के लिए क्योंकि
अंततः भला या बुरा जो भी होगा वो तो जनता का ही होगा. हाँ यह अलग बात है कि, और मैं इससे इनकार भी नहीं करूँगा की इस जनता की भलाई में राजनितिक फायदा भाजपा का है. तो इसमें भी क्या गलत है भाजपा लोकसभा में विपक्ष की भूमिका में भी तो है. तो इन मुद्दों पर धरना प्रदर्शन करना तो बनता ही है.
लेकिन मुझे आश्चर्य तब हुआ जब टीवी पर देखा की चक्का जाम के दौरान जो लोग जाम में फंसे थे वे कह रहे थे
की यह ठीक है की जनता पेट्रोल और दूध के दाम बढ़ने से परेशान है लेकिन इस चक्का जाम से भी तो आम जनता ही परेशान हो रही है. दूसरी तरफ टीवी पर जो रिपोर्टर साहब थे वो कह रहे थे की एक विरोध पिछले दिनों अन्ना हजारे ने किया था जिससे किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई और एक विरोध ये है. तो मैं कहूँगा की अन्ना जी ईमानदार व्यक्ति हैं मैं उनका सम्मान भी करता हूँ लेकिन उनके अनशन से क्या फायदा हुआ मुझे अभी तक नज़र नहीं आया. जो कमेटी गठित की गयी है उसमे दो अध्यक्ष हैं, लोकपाल बिल भी जस का तस पास हो जायेगा मुझे इस पर १००% शक है.
हो सकता है अन्ना जी के अनशन का दूरगामी फायदा हो लेकिन यदि हम उस प्रक्रिया को दूध और
पेट्रोल की कीमतों को कम करने पर भी अपनाएँ तो ६ महीने कमेटी के गठन में, ६ महीने बहस में और
६ माह पेट्रोल और दूध के दामों के मूल्य निर्धारण में लगेंगे और तब तक जो महंगाई नहीं झेल पाया
वो मर जायेगा और जो झेल पायेगा उसे इसकी आदत पड़ जायेगी और दाम फिर बढ़ा दिए जायेंगे.
और इस प्रकार ये खांसी धीरे-धीरे टीबी बन हम सबको खा जायेगी. अब विचार आप कीजिये की अच्छा क्या है
इंजेक्शन या टीबी ????