Wednesday, February 9, 2011

अपने हिस्से क़ी देशभक्ति

देश भक्ति क्या है ? आखिर कौन होता है देशभक्त ? लोग कहतें हैं की फौजी देशभक्त होते हैं इसमें कोई शक भी नहीं है की घर से दूर अपनी जान को जोखिम में डाल देश की सीमाओं और हमारी रक्षा करने वाला एक फौजी देश भक्त होता है और ऐसा भी नहीं है की उसे कुछ बहुत ज्यादा तनख्वाह या वेतन मिलता हो महीनों की हाड़ तुडाने वाली ट्रेनिंग और जोखिम भरी नौकरी के बाद भी एक फौजी को लग-भग कॉल सेंटर में १२ पास कर नौकरी करने वाले के बराबर ही वेतन मिलता है. कुछ अपवाद हो सकते हैं पर फिर भी कुल मिला कर हम शुद्ध रूप से एक सैनिक एक फौजी को देश भक्त कह सकते हैं.
लेकिन क्या सिर्फ फौजियों के देश भक्त होने से काम चल जायेगा, हमारा कोई फ़र्ज़ नहीं देश के प्रति रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता परशुराम की प्रतीक्षा में कहा है की

'‘हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?’'

मैं राम धरी सिंह दिनकर की इस भावना को जीने की बात कर रहा हूँ. तो देश भक्त होने के लिए आपको जो सबसे पहले होना चाहिए वो है ईमानदार. आपको देश भक्त होने के लिए बोर्डर पर जाकर गोलियां चलने की जरूरत नहीं है देश भक्त होने के लिए आपको सिर्फ इतना करना होगा कि आप जो भी कार्य करें उसे इमानदारी से करें. आप जहाँ भी काम करते हैं बस उस काम को इमानदारी से करे. हमारे देश में सरकारी कर्मचारियों पर एक लांछन लगा है कि आपकी सरकारी नौकरी लग गयी है अब आप सरकारी दामाद हो गए. आप उतना काम नहीं करते जितना सरकार आपका ध्यान रखती है. सरकारी नौकरी करने वाले अक्सर ऐसा करते है :-
कार्यालय पहुँचाने पर उन्हें याद आता है कि उन्होंने बिजली का बिल जमा नहीं किया तो हाजिरी लगाने के बाद काम करने बजाये ऑफिस के समय में आप बिल भरते हैं.
कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों ये लोग अपना काम ईमानदारी से पूरे समय तक नहीं करते ? कई बार मैं अपने या घर के किसी काम से बैंक जाता हूँ तो देखता हूँ की बैंकिंग का समय तो ९:३० से शुरू होता है. लेकिन ९:३० बजे बैंककर्मी आते ही हैं जिससे सुबह ऑफिस जाने वालों को देर होती है ऐसा एक बार हो तो चलता है लेकिन एक तो ये रोज़ कि कहानी है दूसरा बैंक में लेट होने के कारण अन्य जगह काम करने वाले लेट होते हैं और फिर ये एक चैन बन जाती है. जो कि लेट लतीफी कि आदत डालती है

ईमानदारी का दूसरा पहलू भी है
१) क्या आप अपना आयकर सही जानकारी और सही समय पर भरते है?
२) क्या इसी प्रकार के अन्य कर भी जो देने जरूरी हैं उन्हें भरते हैं ?
३) क्या आप सड़क पर गाड़ी चलाते समय रेड लाईट के दिशा निर्देशों का पालन करते हैं?
४) क्या आप मोटर साईकल चलाते हुए हेलमेट का प्रयोग बिना पुलिस वाले रास्तों पर भी करते हो ?
५) क्या आप अपना फ़ोन, पानी, बिजली बिल समय पर भरते है ?
६) क्या आप पानी और बिजली का सही इस्तेमाल करते हैं ? आदि आदि

हम अपनी जिम्मेदारी को यह कह कर नहीं टाल सकते कि सरकार है वो करेगी. जहाँ लोग जागरूक नहीं होते वहां सरकारें भी लापरवाह होती हैं आज देश में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है उसके पीछे भी कुछ हद तक हमारा ही हाथ है पानी का बिल भरने गए और लाइन लम्बी मिली तो हमने १० रूपये देकर काम करा लिया या फिर बिना हेलमेट लगाये जा रहे हैं और पुलिस ने पकड़ लिया तो भी हम २० -५० देकर निकल जाते हैं लेकिन इससे हुआ ये की अब उन्हें आदत हो गयी वो बिना २०-५० लिए काम करते ही नहीं है. और अब तो १० से काम चलता ही नहीं है अब १० की जगह धीरे धीरे दाम भी बढ़ रहा है सिर्फ १० से गुजरा नहीं होता और काम के ५०, १००, ५०० तक लिए जाते हैं कहावत मशहूर है 'सरकारी ऑफिस में काम करना है तो चपरासी को पटा लो' काम जल्दी हो जाता है. इस भ्रष्टाचारी शासन पर दो लाइन राम धारी सिंह दिनकर जी कि :-

'जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,

अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।'

शेष अगली पोस्ट में

9 comments:

  1. वादा करते है की अपने हिस्से की देश भक्ति निभायेगे, सरकारी बाबुओ को पैसा नही खिलाएगे.

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  2. वाह मजा आ गया. अद्भुत ब्लॉग, प्रासंगिकता के साथ साथ लेख को साहित्य के स्तंभ पुरुष रहे दिनकर से जोड़ना, वाकई मजा आ गया. पर एक सलाह मेरी मान ले भाई, हिंदी पर ध्यान दे. फिर साला आसमां तुम्हारा होगा.

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  3. @ विपिन भाई धन्यवाद पर मैं चाहूँगा की इस सोच के साथ जीना सीखें क्योंकि मैं सिर्फ लिखने के लिए नहीं लिखता
    @ कैलाश भैया सिर्फ बाबुओं को पैसा न देने से जिम्मेदारी खत्म नहीं होती आगे की कहानी इस ब्लॉग के अगले हिस्से में है.
    @ चन्दन भाई धन्यवाद हिंदी पर भी कोशिश लगातार जारी है धीरे-धीरे चल रहा हूँ थोड़ा बहाना है की यूँ कह सकते हैं ऑफिस में समय की कमी के चलते अच्छे संपादन की कमी रह जाती है और मुझे इसका अगला हिस्सा ज्यादा पसंद है टाइप कर चूका हूँ अगले सप्ताह डालने की सोच रहा हूँ

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  4. यही बात मैंने भी अभी कही थी। 26 जनवरी वाले लेख में।
    देशभक्ति की मूल भावना हिंसा से ज्यादा ज़िम्मेदारी की ही है। पर इसके सुविधाजनक अर्थ गढ़ लिए गए हैं। उन्हें ख़ारिज़ करने का समय है। इसी तरह लिखते रहो। शुभकामनाएं।
    तुमने तो पढ़ा ही है। फिर भी लिंक डाल रहा हूं।

    http://www.bhaiyajikikalam.blogspot.com

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  5. कुलदीप भाई ये मैंने कहा था न की बहुत दिन से लिखने के बारे में सोच रहा हूँ पर समय नहीं मिल रहा था और इसमें वो लिस्ट भी है की लोग क्या करें २६ जनवरी और १५ अगस्त पर .. अगली पोस्ट में और सुझाव भी है

    धन्यवाद

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  6. वाह मनपसंद ब्लॉग मिला विकास भाई अभी जल्दी में हूँ और जाते जाते आपको फोलो करते चलूँ और फ्री समय में आपके ब्लॉग पर आउंगा,

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  7. धन्यवाद क्रन्तिकारी हिन्दुस्तानी देश सेवक जी.....खुसी होगी आते रहिएगा ...

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