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देश भक्ति दिखनी भी चाहिए :-
मैंने कई बार देखा है (और देखा क्या है मैं खुद भी कुछ हद तक इसी में शामिल हूँ) युवा अगर पार्टी में जाते हैं तो डीजे पर बज रहे फ़िल्मी गाने को जोर जोर से गाने में नहीं हिचकते लेकिन वही युवा अगर किसी धर्म संस्कृति के काम जैसे भजन कीर्तन या जागरण में हो यहाँ तक की कुछ तो अपने घर में ही हो रहे कथा-हवन में हिस्सा लेने में कतराते हैं या फिर किसी सामाजिक मुद्दे को लेकर मार्च, जुलूस या प्रदर्शन हो तो वहाँ नारे लगना स्वाभाविक है अगर आप कीर्तन या जागरण में है तो 'जय माता दी' भगवान् शिव या राम और कुछ भी जयघोष या आप किसी मार्च, जुलूस या प्रदर्शन में है तो 'वन्दे मातरम' या भारत 'माता कि जय' या कुछ और तो युवा या तो इनमे हिस्सा ही नहीं लेते और भगवान कि दया से ले भी लिया तो अपनी बातों में मशगूल रहेंगे पर नारे नहीं लगायेंगे ना जाने क्यों शर्म आती है मेरा ऐसा मानना है की जब आप शामिल हो ही गए है तो मन से नारे या जयघोष लगायें. और मैं शादी या किसी भी कार्यक्रम में फ़िल्मी गाने गाने के लिए मन नहीं कर रहा हूँ.
इम्पोर्टेड है तो बढ़िया है वाली मानसिकता :-
आज लोगों के दिल में ये बात घर कर गयी है कि बाहर बनने वाली हर चीज अच्छी होती है चाहे फिर वो कुछ भी हो हर छोटी से छोटी चीज़ इम्पोर्टेड ही चाहिए जैसे कपडे, साबुन, दंतमंजन, मोटर साईकल, कार, घड़ी या और कुछ भी, हम कुछ भी स्वदेशी इस्तेमाल करना ही नहीं चाहते. हमें घर में आने वाली हर छोटी चीज़ विदेशी चाहिए चाहे वो कुछ भी हो, कुछ चीज़ों को छोड़ दें तो बाज़ार में स्वदेशी और अच्छी चीज़ें आराम से मिल जाती हैं और मैं तो कहूँगा की अगर इसके लिए कुछ पैसे ज्यादा खर्च करने हो तो करेंगे, लेकिन ऐसा कम ही होता है कि स्वदेशी चीज़े महंगी हो.
एक उदाहरण है :- आज कोलगेट के विज्ञापन में जो दिखाया जा रहा है ‘कि क्या आपके पेस्ट में नमक है ?’ कोई जाकर इन्हें ये बताये की भारत के सबसे पिछड़े गाँव में जहाँ स्कूल भी नहीं होगा वहां भी लोग यह बात बता देंगे की नमक से दांत साफ़ करना कितना लाभकारी है और जितने भी लोग ये पढ़ रहे हैं उन्होंने अपने गाँव में या यहीं शहर में दांत में दर्द होने पर माँ या पिताजी के कहने पर हल्दी नमक को मिला कर दांतों पर रगड़ा होगा और ये बात आज हमें कोलगेट वाले बताएँगे. और मजेदार तो ये है की लोगों ने उनकी बात मान खरीद भी लिया, लेकिन अपने घर वालों कि बात मान कभी नमक या राख से दांत साफ़ नहीं किये होंगे ये हमारी ही कमी है कि विदेशी है इम्पोर्टेड है तो बेहतर है.
पढ़ाई के लिए या पढ़ाई के बाद विदेश :-
आज कल ना जाने कहाँ से ये सोच विकसित हो गयी है कि भारत में अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कि जा सकती और युवा विद्यार्थी विदेशों का रुख करने लगे हैं मुझे इससे ज्यादा दिक्कत तब होती है जब आप पढने गए और वही के हो के रह गए. और वहां जा कर कहते हैं कि भारत रहने लायक जगह नहीं है वहां दकियानूसी और रूढ़ीवादी विचार वाले लोग रहते हैं, मन तो करता है गोली मार दूँ ऐसे लोगो को. लेकिन इससे भी ज्यादा गुस्सा तब आता है जब अपने ही देश के कुछ विद्यार्थी यहीं से शिक्षा प्राप्त कर प्लेसमेंट में विदेशी कम्पनियों से मिले बड़े पैकेज पर इतराते हुए विदेश भाग जाते हैं और कहते हैं भारत कभी तरक्की नहीं कर सकता. भारत ने आपको इतना बड़ा बनाया कि आपकी मांग विदेशों में भी है. और आपने भारत को ही लात मार दी क्यों आपने यह जिम्मा अपने सर नहीं लिया कि कुछ दिन कम पैसों में काम करेंगे पर देश में रहकर देश के लिए ही काम करेंगे, देश कि तरक्की के लिए काम करेंगे . मैं तो चाहता हूँ कि कानून बना देना चाहिए उच्च शिक्षा लेने के बाद कम से कम 7 या 10 साल आप कहीं बाहर काम नहीं कर सकते. आपको अपने ही देश में काम करने होगा आपको अच्छा पैसा भी मिलेगा ऐसा नहीं है कि मुफ्त में आपको घसीटा जायेगा. लेकिन ये बहुत मुश्किल है.
ये सभी बातें कुछ लोगों को अजीब लगेंगी लेकिन ये सच है आप बिना बोर्डर पर जाये भी इसी तरह के कुछ और काम कर अपनी देशभक्ति दिखा सकते हैं बस कुछ बातों का ध्यान रखना होगा और बस हो गया. शाहरुख़ खान अभिनीत चक दे इंडिया का ये डायलोग आज भी मुझे याद है कि मैदान में खेलते समय पहले देश के लिए खेलो फिर अपनी टीम के लिए और अगर फिर भी कुछ जान बच जाए तो अपने लिए, उसी तरह मैं मानता हूँ कि हम पढ़ाई देश के लिए करते हैं फिर समाज के लिए और फिर अपने परिवार के लिए.
बाकी रही बोर्डर पर लड़ने कि बात तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए. अमेरिका में २ साल की आर्मी ट्रेनिंग अनिवार्य है क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता??, लेकिन एक बार एम टीवी पर एक पोल हुआ था कि क्या अमेरिका की तरह यहाँ भी ट्रेनिंग को अनिवार्य नहीं किया जा सकता?? तो सिर्फ ५२% लोगों का जवाब हां था जबकि एम टीवी एक युवा फेम चैनल है इसी पर कवि हरिओम पवार कि पंक्तियाँ कुछ यूँ हैं :-
क्या ये देश उन्ही का है जो युद्धों में मर जाते हैं,
अपना शीश कटा कर के सरहद को पार कर जाते हैं,
ऐसा युद्ध वतन कि खातिर सबको लड़ना पड़ता है,
संकट कि घड़ियों में सबको सैनिक बनना पड़ता है,
ये गाथा, उनको सूरज कि लाली में रख देती है,
और हाड़ा रानी शीश काट कर थाली में रख देती है
Sunday, February 20, 2011
अपने हिस्से की देशभक्ति - २
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टीका-टिप्पणी व हाहा-हीही कर उच्च विचारो का प्रसार नही हो पता.
ReplyDeleteअतः Comment नहीं, चर्चा ही करूँगा..
सही कहा लेकिन सबकी अपनी शैली होती है, कुछ लोग हर बात को गंभीरता से कहना पसंद करते हैं तो कुछ हस्ते हुए साड़ी बातें कह देते हैं, फर्क इस बात से पड़ता है की जिससे बात कर रहे हो वह उस विषय को लेकर कितना गंभीर है, और अगर मैं ये लिख रहा हूँ तो मैं इस सोच के साथ जीने का इस भाव को जीने का विचार रखता हूँ और पूरी कोशिश करता हूँ तो अपनी बात ब्लॉग पर कहोगे तो ज्यादा गंभीरता रहेगी वरना जब भी मिलते हैं तो क्या बातें होती हैं ये तुम भी जानते हो और मैं भी,.. और शायद इस बहाने तुम भी लिख दो अपने ब्लॉग पर कुछ, .. मुझे इंतज़ार है की तुम लिखो और मैं पढूं
ReplyDeleteहम सही दिशा में भी सोचना शुरु कर दें, तब भी हमारी पूर्व-धारणाएं हावी हो जाती हैं। इस लेख के साथ भी कहीं कहीं ऐसा दिख रहा है भाई। फिर भी मैं इस प्रयास से प्रभावित हूं। वैसे ईमानदारी से कहूं तो और बेहतर अपेक्षित था।
ReplyDeleteकैलाश से तो भयंकर असहमति है। जो आप लिखते हैं उसी से आपकी गंभीरता और आपका पक्ष परिलक्षित होता है। हो सकता है कि विकास से मिलने पर आप सम्मानवश या किसा दबाव में अपनी राय को ठीक तरह से न रख पाएं। कमेंट करने का मतलब बतकही करना या ख़ामख़ां तारीफ करना नहीं होता। अगर आप ऐसा समझते हैं तो धारणा को बदलिए। चीज़ें लिखने से ही बदलती हैं दोस्त। :)
कुलदीप भाई धन्यवाद और इसमें बहुत कुछ जोड़ा जा सकता है आप भी जोड़े तो अच्छा लगेगा जो भी आपके मनन में हो वो कमेन्ट के जरिये बता सकते हो कोई परेशानी नहीं है,.. और बेहतर अपेक्षा से ही सुधार की संभावनाएं बढती है... अगली बार कोशिश करूँगा
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