Friday, April 1, 2011

रोटी महंगी गाड़ी सस्ती : ये भी कोई बात हुई

भारतीय अर्थव्यवस्था का हाल कुछ अजब गज़ब चल रहा है पिछले कुछ सालों में रोटी महँगी हो गयी है और गाड़ियाँ सस्ती हो गयी हैं,.. भारत में दीपावली का त्यौहार सबसे बड़ा हर्षोल्लास का त्यौहार माना जाता है.. उस देश में यदि दिवाली की रात की पांच लाख लोग भूखे सोते हों तो उस देश में रोटी को महंगा कर
गाड़ी सस्ती करने का कोई भी तर्क मेरी समझ से बाहर रहा है. और क्योंकि मैं कोई बुद्धिजीवी नहीं हूँ तो अर्थव्यवस्था का मैथ मैटिक जरा कम ही समझ आता है.. लेकिन फिर भी जिस देश में एक भी आदमी भूखा सोता है उस देश में यदि आप गाड़ियाँ सस्ती करते है तो यह मेरी समझ से बाहर है.
इस बारे में अगर आपने किसी से सवाल कर लिया तो वो कहेगा की देश तरक्की कर रहा है और गरीबी घट रही है. लेकिन सच मानिये मुझे ऐसा नहीं लगता.. क्योंकि हमारे यहाँ तो गरीबी नापने का पैमाना ही गलत बनाया गया है अभी जो पैमाना काम कर रहा है वो यह है की गाँव में यदि कोई व्यक्ति ३०० रुपये प्रतिमाह कमाता है तो वह गरीबी रखा से ऊपर माना जायेगा. दूसरी और शहरों में यह पैमाना ६०० रुपये रखा गया है की यदि शहर में किसी की प्रति व्यक्ति आय ६०० रुपये प्रति माह है तो आप गरीबी रेखा से ऊपर है.. तो आप मुझे एक बात बताएं की जिन लोगों ने यह पैमाना निर्धारित किया है वह खुद तो एक वक़्त के नाश्ते पर १००० रुपये से ज्यादा खर्च करते हैं .. और पैमाना कुछ ऐसा बनाया है की मिल जाये तो सच में इतनी चप्पल मारूंगा की सारे अर्थव्यवस्था का 'अ' भी भूल जाए..
क्या कोई तरीका नहीं निकला जा सकता की पहले गरीबी को जड़ से ख़त्म किया जाये हमारी जनसँख्या लगातार बढ़ रही है और इसी के साथ गरीबी भी .. पिछले दिनों एक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक ७७% भारतीय प्रतिदिन २० रुपये से अपना गुज़ारा चलाते हैं इन अर्थव्यवस्था के नीतिनिर्धारकों से कोई ये पूछे की क्या तुम्हारे बच्चे २० रुपये की जेब खर्च अपना प्रतिदिन का काम चला लेते हैं जो आपने ऐसी निति बनाकर छोड़ी है. तो यहाँ कुछ ऐसा नहीं हो सकता की हम पहले अपने देश की गरीब जनसंख्या को जो की बीपीएल के अंतर्गत आती है उसे माध्यम वर्गीय बनाने का प्रयास करें और जितनी भी निजी कम्पनियां हैं उनसे भी इस और कदम बढाने की अपील की जाये. और यह सब बड़े और ऊँचे स्तर पर हो जिससे की बड़ी निजी कंपनियों पर असर पड़े,.. मैंने ११ वीं कक्षा में राजनीति विज्ञानं में थोडा सा पढ़ा था की राज्य को कल्याणकारी कार्य करने चाहिए. तो यहाँ राज्य और सरकार को कल्याणकारी बनकर कार्य करने की जरूरत है.
सरकार को निजी कंपनियों को सिर्फ यह समझाना होगा की कुछ दिन कल्याण कारी बनकर कार्य करें और जैसे ही सबको अच्छे से रोटी और उसके बाद कपडा और मकान मिल जाये तो गाड़ियों के दाम भी बढ़ाये जायेंगे और इस बार जब आप गाड़ियों के दाम बढ़ायेंगे तो आपके पास एक अच्छा और बड़ा मध्यमवर्ग होगा जो गाड़ियों को खरीदने का इच्छुक होगा.. इससे विकास भी होगा और शिकायतें कम होंगी और करना सिर्फ इतना होगा की थोड़ा सा धैर्य रखते हुए थोड़ा सा कल्याणकारी होते हुए .. इमानदारी से कार्य करने होंगे.

3 comments:

  1. प्रिय विकास जी आपका हमारे देश की गंभीर होती जा रही समस्या पर प्रस्तुत लेख बहुत पसंद आया आप प्रयास जारी रखीए हमारी शुभकामनाये आपके साथ हैं !

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  2. साहेब,
    अर्थव्यवस्था का पिंजरा चंद पईसा वाले लोगो की रचना है. हम पिंजरे के अन्दर है वो बाहर...

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  3. धन्यवाद भाई देशभक्त जी और कैलाश भाई आपकी बातों में सच्चाई है लेकिन याद रखो जितने लोगो को पिंजरे में रखने की कोशिश की जा रही है ,.. वो बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती क्योंकि अब देश में एक ब्राजील और जुड़ गया है तो पिंजरा कमजोर हो रहा है लेकिन अभी तक किसी ने भी पिंजरे को तोड़ने की कोशिश नहीं की है.. जिस दिन की जाएगी उस दिन भागने के लिए धरती छोटी हो जाएगी

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