Wednesday, April 27, 2011

कॉलमों में बंटा पत्रकार (प्रिंट)

नमस्कार,

समाचार पत्र में काम करने वाले व्यक्ति की मानसिकता और उसकी सोच धीरे-धीरे उसे प्रत्येक घटना और ऐसा कोई भी घटना क्रम जो एक प्रिंट पत्रकार के सामने घटित होता है उसे लेकर प्रिंट मीडिया में काम करने वाले व्यक्ति का अपना एक नजरिया विकसित होता है या होता चला जाता है
फिर वह प्रिंट पत्रकार आम व्यक्ति नहीं रहता वह मशीन हो जाता है कुछ हद तक, जो किसी भी खबर या घटनाक्रम को अखबार या मैगजीन छापने के लिए उसका आंकलन भावनात्मक रूप में करना छोड़ देते हैं. ऐसा तब ज्यादा होता है जब उस पत्रकार को लगभग पिछले डेढ़ महीने से छुट्टी नहीं मिली हो, नए एडिसन लॉन्च करने के चक्कर में चार वीक ऑफ़ भी नहीं मिलें हो. यहाँ तक की आपके पेज का समय १२ की जगह १:३० हो गया हो और छोड़ते छोड़ते २ बजे और घर पहुँचते-पहुँचते तीन. तो ऐसा ज्यादा जल्दी होता है और आपका जीवन अखबारमय होने लगता है. ऐसा इसलिए भी हो सकता है की आप अपने काम के साथ ही एन्जॉय करने की कोशिश करने लगते हैं जिससे छुट्टी न मिलने पर काम बोझ न बने.
अब आप देखिये की किन ख़बरों और घटनाक्रमों को किस मानसिकता से लिया जाता है दो बहुत ताज़ा और बहुत छोटे उदाहरण देता हूँ :-
१) रात के २:४५ कैब से घर जाते समय अक्षरधाम मंदिर के सामने कंटेनर ट्रक पलटा हुआ देखा तो अनायास ही कैब में आगे की शीट पर बैठे सर के मुंह से निकला की अरे फोटो खींच लो और फिर अगली लाइन मेरी थी की लो एक और "सिंगल कॉलम" और अगर समय दिन का होता तो शायद "डीसी" (डबल कॉलम) या "टीसी" (तीन कॉलम) होती क्योंकि फिर खबर के साथ पलटे हुए कंटेनर के पीछे लगे जाम का फोटो भी होता.

२) सत्य साईं बाबा की मृत्यु के बाद अखबार ने एक पूरा पेज बाबा को समर्पित किया. तो ऑफिस में बैठे बात करते हुए अचानक ख्याल आया की जब बाबा की तबियत ख़राब हुई उस दिन बाबा सिंगल कॉलम थे, तबीयत थोड़ी बिगड़ी तो डीसी और टीसी हो गए वो भी फोटो के साथ और अपने अंत के साथ अंततः बाबा पूरा पेज हो गए. तो भाई लोगों इसे कहते हैं
"जिन्दा हाथी लाख का
मरा सवा लाख का
"

अखबार का ऑफिस एक अजीब जगह होती है जहाँ ख़बरों के चक्कर में अक्सर ऐसा होता है, आप ही बताएं आपको कैसा लगेगा अगर आपको को सुनने को मिले की बस खाई में गिर गयी है और इस हादसे में ४ बच्चों सहित १० लोगों की जान चली गयी. आपके लिए ये एक दुखद घटना है और सामान्य रूप से पत्रकार के लिए भी लेकिन जब पत्रकार ऑफिस में होता है तो इसी खबर को कहता है की "एक बड़ी और अच्छी खबर आई है लीड बनाओ" और जानते हैं यह सब कब होता है यह तब होता है जब आधी दुनिया सो रही होती है और पत्रकार अखबार छापने क़ी आपाधापी और ढेर ख़बरों में से ख़बरों के चयन में लगा होता है अन्दर ऑफिस की जगमगाती लाइटों के बीच उसे याद भी नहीं होता की दिन नहीं रात है.

टूटता है कॉलम
लेकिन इस सब के बाद भी पत्रकार, इंसान ही रहता है और कई बार ऐसा कुछ हो जाता है की कॉलमों में बंटा पत्रकार अचानक इंसान हो जाता है और उसे भावना और दर्द दोनों चीज़ों का अर्थ समझ आ जाता है छोटा सा उदाहरण :-
पिछले दिनों धौलाकुआँ स्थित दक्षिण परिसर के कॉलेज रामलाल आनंद की एक छात्रा की गोली मार कर हत्या कर दी गयी,.. मैंने भी उसी कॉलेज से पढ़ाई की है तो उस लड़की को जनता भर था,.. या कहूँ की उस लड़की से मौकापरस्त दोस्ती थी मतलब काम की दोस्ती वो भी सिर्फ इस लिए की मेरा दोस्त चुनाव लड़ रहा था तो वोट लेने के चक्कर में सबसे बात करनी होती थी.. जिनमें वो लड़की "राधिका" भी थी लेकिन उस लड़की की हत्या की खबर जब मुझे ही पढ़ने को मिली और मेरे ही पेज पर मैंने ही लगायी, तो न जाने दिमाग में क्या चल रहा था.. मुझे ठीक से याद भी नहीं, पर कुछ था जरूर जिसने करीब उस पूरी रात तो मुझे बेचैन रखा..अन्दर कहीं उसका चेहरा और उसकी मुझसे दो साल कम उम्र कहीं न कहीं घूमती ही रही.. दिमाग कॉलमों में तो उस दिन भी बंटा लेकिन एक अजीब सी कशमकश साथ थी..

मैंने ऊपर सत्य साईं बाबा के निधन का पर जो कमेन्ट किया है यदि उस से किसी को दुःख हुआ है तो क्षमा प्रार्थी हूँ , शायद में ऐसा इसलिए लिख पाया क़ी में भी एक पत्रकार बनने क़ी प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा हूँ

9 comments:

  1. बंट गया भाई, बंट गया. तू भी बंट गया. आगे बढ़ने के लिए बंटना अच्छा है. तभी शायद तुम इस बंदरबांट को तोड़ भी पाओ.
    लेकिन क्या कमाल की आत्मकथा (आत्मव्यथा) लिखी है तुमने, हम पत्रकार जातियों की. एकदम से पत्रकारों की मानसिक दलितिकरण का नमूना पेश कर दिया भाई. बधाई के पात्र हो, साधुवाद.
    बस एक विनती है, थोड़ा प्रूफरीड पर ध्यान दिया कर. लेखनी में गलतियां विचारों को बांट देती हैं, अखबार के कॉलमों की तरह.
    चंदन कुमार, उप-संपादक, जागरण जोश.कॉम

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  2. धन्यवाद भाई, और इस बार जब मिलेंगे तो मुझे तुझसे कुछ पूछना है,.. इस बार पक्का बैठकर ये काम करना है ओके .. हर बार बकैती ही होती है यार

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  3. अरे भैया आप ब्लॉग को फोलो कर रहे हैं धन्यवाद

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  4. भाई,
    खबरों की आपाधापी के बीच मानवीय संवेदनाओ के बारे में आपका चिंतन करना वाकई अद्भुत है.

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  5. vyavsayikaran ki iss aandhi mein mulyo ko talashta ye lekh sach mein accha h vikas bhai.

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  6. इस लेख को पढ़के आपकी परेशानी समझ रही हूँ... नाईट शिफ्ट में व्यक्ति झुंझला जाता है और फ्रसट्रेट हो जाता है... वो झुंझलाहट इस लेख में दिखी. अच्छा है आपने लेख के जरिये फ्रसट्रेशन निकाल दी क्योंकि इससे तो छुटकारा मिलेगा नहीं. मीडिया में ये झेलना पड़ेगा. अच्छा लगा. इसी तरह फ्रसट्रेशन निकालते रहिये और काम करते रहिये.
    धन्यवाद

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  7. धन्यवाद स्वाति, कैलाश और नेहा
    नेहा मैं काम काम से परेशान नहीं हूँ , न रात में काम करने से झुन्झुलाहत होती है ये मेरी पसंदीदा शिफ्ट है मज़ा भी आ रहा है,.. सीख रहा हूँ एक नया अनुभव ले रहा हूँ,.. और ये फ्रसट्रेसन नहीं है ये तरीका है की अब ख़बरों का मूल्यांकन करना आ रहा है ..:-):-

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  8. i know your problem, its a part of job, shuruat me aisa hota hai, dheere dheere sab settle ho jayega, bus enjoy your work, pareshani kam ho jayegi, abhi to tumhe lamba rasta tay karna hai, bus yu samajh lo ki jo raste mushkil nahi hote, wo achha nahi hota.

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  9. पत्रकारों की पेशागत मजबूरी बन चुकी है- यह असंवेदनशीलता. इसके लिए भी सूचना तंत्र का मौजूदा आर्थिक ढांचा ही ज़िम्मेदार है. सहारा समय का मेरा भी ऐसा अनुभव था. तुम्हें बताया था शायद मैंने. तुमने सही कथा लिखी है दोस्त. जो दो उदाहरण शुरू में दिए, वे लाजवाब थे. ख़ास तौर पर कंटेनर वाला, पढ़कर समझ नहीं आया कि हंसना चाहिए या रोना.
    बेहतर लेखन के लिए बधाई.

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