Thursday, December 8, 2016

दरवाजा खुला तो घर खाली था ...





#be in touch

कुछ सेकंड इंतज़ार कर दरवाज़े को धक्का दिया तो वो पहले ही खुला था ... वो दिसंबर की ठंडी शाम थी ... जल्दी दिन ढलता है इन दिनों .. कदम बढ़ाया तो अँधेरा था और कुछ कदम पर सीढियां .. जो दिख तो रही थीं .. लेकिन अजीब सी शांति थी जैसे वहां कोई हो ही न ... मैंने कदम वापस लिया और वापस गेट की तरफ बढ़ा .. कि अचानक अँधेरे में से किसी ने मेरी जैकेट पीछे से पकड़ी और मुझे लगभग खींचते हुए .. कहा कमीन रुक तो जा .. हाँ ठीक सुना कमीन .. हाँ ये गाली है .... लेकिन तब ये गाली नहीं थी ... (कमीन बोलने का हक़ उसने कमाया था) उसने अब जैकेट को पीछे से छोड़ कॉलर पकड़ते हुए कहा .. जा क्यों रहा था ... मैंने कहा क्योंकि घर में कोई नहीं है इसलिए .. (उसकी इतनी हिम्मत देखते ही समझ गया कि घर खाली है) उसने कहा कोई नहीं है तभी तो तुझे बुलाया है पागल .. मैंने बोला अच्छा और एक हाथ उसकी कमर में डालते हुए उसे अपनी ओर खींचा .. उसने कॉलर अब भी पकड़ा हुआ था ... वो बोली अच्छा ऊपर तो चल ... ऊपर पहुंचे तो रौशनी थी और घर सच में खाली था .. रौशनी में आते ही दिमाग काम करने लगा .. और शर्त याद आगयी .. मैंने बोला तूने शर्त पूरी नहीं की ... अब बोल क्या करेगी ... ??


अरे तू जो कहेगा वो करूँगी बस .. पर पहले जिस लिए बुलाया है वो सुन .. मैंने भी कहा हाँ बोल सुन रहा हूँ लेकिन अभी तक उसे छोड़ा नहीं था मेरे हाथ अब भी उसकी कमर पर थे.. बोली कमीन छोड़ तो बताती हूँ ... मामला सीरियस लगा ... तो इसे छोड़ा और दीवार से लग कर खड़ा हुआ और कहा बोल ... उसने कहा मम्मी से बात की थी ... कि तेरे यहां जाए बात करने पर वो टाल रहीं हैं बार - बार ... सुनती ही नहीं हैं मेरी बात ... मैंने कहा तूने ही ठीक से बात ही नहीं की होगी ... तो बोली यार हद है सब बता दिया उन्हें ... कि तू अच्छा दोस्त है .. वो खुद भी तेरी तारीफ करती हैं... तो अब क्या ये भी बताऊँ की तेरे साथ घूम रही हूँ आजकल ... फ़िल्म देख रही हूँ ... घर से झूठ और टीचर होके स्कूल से खुद ही बंक मार के तुझसे मिलने जाती हूँ ... कमीन कहीं का .. मैंने कहा अच्छा गुस्सा क्यों हो रही है तू कहे तो मैं बात करूँ ... ??? वो बोली ना जी स्वामी आप रहने दो ... आपने बात की तो ड्रामा ही हो जाना है घर में ... मैंने कहा फिर .. तो बोली सुन न .. मैं क्या सोच रही थी कि तू जयपुर या भोपाल जाने के लिए कह रहा था न जॉब के लिए .. एक काम कर मुझे भी ले चल ... मैं उसके पास गया हाथ से उसका मुंह खोला और सूंघते हुए बोला पापा वाली बोतल तूने चढ़ा ली क्या ... तुझे ले चलूं मज़ाक हो रहा है क्या ... तू एक बार ठीक से बात कर अपनी मम्मी से ... तो गुस्से में बोली अरे पागल है मेरी माँ .. वो सुनती ही नहीं है ... ले चल न किसी को पता भी नहीं चलेगा ... मैंने कहा तेरा दिमाग ख़राब है ... तो बोली अच्छा तेरा बड़ा सही है जब अपनी उस सहेली के साथ शिमला गया तब तेरा और उसका दिमाग सही था ... लेकिन मेरा ख़राब है ... कमीन सारी दुनिया के साथ घूमेगा बस मेरे साथ मौत आ रही है ...  यार समझा कर मेरी माँ न सुनेगी मेरी बात ... कोई तेरे घर भी न जायेगा ... तू मानता क्यों न है कमीन ... झुंझलाते हुए उसने कहा ... और फिर कॉलर पकड़ लिया ...

To be continued ... 

Wednesday, December 7, 2016

... और उसके घर की घंटी बजा दी



मोहल्ले की सबसे छोटी और तंग गली से निकलना मेरे लिए करीब 22 साल तक अजीब रहा ... सिर्फ काम के लिए ही मैं इस गली में आया जाया करता था ... लेकिन जो 23वां साल लगा ... तो मोहल्ले में घुसने के बाद ... घर तक जाने के लिए .. बाकी सारी गलियों को साँप सीढ़ी बनाते हुए उस गली से निकलने की जिद शुरू हुयी ...  
इतना ही नहीं गली में घुसने के साथ ही एक खिड़की पर नजर टिक जाती थी कि शायद वो दिख जाए। लेकिन ऐसा कभी होता नहीं था। उससे बात तो होती थीं, लेकिन उसे देखभर लेने की इच्छा उस गली में ले ही जाती थी।  ... फिर एकदिन फ़ोन पर बात करते हुए उसने कहा कि घर आजा .... और दिल्लगी देखिए कि घर से दो गली दूर होने ... गली वालों के तानों की बात और सारी सामाजिकता को रौंदते हुए कदम उसके घर की ओर बढ़ने लगे .. लेकिन फिर अचानक एक शर्त तय हुयी कि आऊंगा तभी जब तेरी मांग में सिन्दूर होगा ... और शर्त सिर्फ इतनी ही नहीं थी .. उसका अगला हिस्सा ये था कि अगर मांग में सिंदूर न हुआ तो मैं जो कहूंगा वो करना पड़ेगा। इसके बावजूद वो तैयार थी जबकि जानती थी कि मेरे कुछ भी का मतलब उसके लिये कई बार भारी पड़ चुका है।
वहीँ एक और बात जो मेरे दिमाग में साफ़ थी वो ये कि कोई भी लड़की शादी से पहले सिंदूर लगाने में झिझकेगी,,, चाहे वो गर्लफ्रेंड हो ... प्रेयसी हो या फिर मंगेतर ही क्यों न हो .... यह सोचते हुए मैंने उसके दरवाजे की घंटी बजा दी ...
to be continued ...