मोहल्ले की सबसे छोटी और तंग गली से निकलना मेरे लिए करीब 22 साल तक अजीब रहा ... सिर्फ काम के लिए ही मैं इस गली में आया जाया करता था ... लेकिन जो 23वां साल लगा ... तो मोहल्ले में घुसने के बाद ... घर तक जाने के लिए .. बाकी सारी गलियों को साँप सीढ़ी बनाते हुए उस गली से निकलने की जिद शुरू हुयी ...
इतना ही नहीं गली में घुसने के साथ ही एक खिड़की पर नजर टिक जाती थी कि शायद वो दिख जाए। लेकिन ऐसा कभी होता नहीं था। उससे बात तो होती थीं, लेकिन उसे देखभर लेने की इच्छा उस गली में ले ही जाती थी। ... फिर एकदिन फ़ोन पर बात करते हुए उसने कहा कि घर आजा .... और दिल्लगी देखिए कि घर से दो गली दूर होने ... गली वालों के तानों की बात और सारी सामाजिकता को रौंदते हुए कदम उसके घर की ओर बढ़ने लगे .. लेकिन फिर अचानक एक शर्त तय हुयी कि आऊंगा तभी जब तेरी मांग में सिन्दूर होगा ... और शर्त सिर्फ इतनी ही नहीं थी .. उसका अगला हिस्सा ये था कि अगर मांग में सिंदूर न हुआ तो मैं जो कहूंगा वो करना पड़ेगा। इसके बावजूद वो तैयार थी जबकि जानती थी कि मेरे कुछ भी का मतलब उसके लिये कई बार भारी पड़ चुका है।
वहीँ एक और बात जो मेरे दिमाग में साफ़ थी वो ये कि कोई भी लड़की शादी से पहले सिंदूर लगाने में झिझकेगी,,, चाहे वो गर्लफ्रेंड हो ... प्रेयसी हो या फिर मंगेतर ही क्यों न हो .... यह सोचते हुए मैंने उसके दरवाजे की घंटी बजा दी ...
to be continued ...
to be continued ...
No comments:
Post a Comment