Wednesday, August 31, 2011
विज्ञापन के पीछे छोटे और बड़े होते आइडल
नमस्कार,
आमतौर पर लोग टीवी पर आने वाले विज्ञापनों पर ध्यान नहीं देते या किसी विशेष विज्ञापन या विशेष परस्थितियों में ही ध्यान दिया जाता हैं . जैसे की ऐश्वर्या राय का कोई नया विज्ञापन आने वाला हो, एसआरके या रणबीर कपूर का कोई नया पेप्सी वाला विज्ञापन हो, बिग बी आ जाये तो क्या बात है या फिर अक्षय कुमार का थम्सअप के लिए किया गया गया कोई जबरदस्त स्टंट हो तो लोग इन विज्ञापनों का इंतज़ार करते हैं. लेकिन अभी विज्ञापन जगत में कुछ नए सितारों ने भी कदम रखा है जो की एक अलग तरह के विज्ञापन करते आपको नज़र आयेंगे और उनके द्वारा किया विज्ञापन प्रभावकारी हो या न हो लेकिन उसके पीछे की सोच जरूर प्रभावकारी होती है ऐसा मुझे लगता है. हाँ इन विज्ञापनों में कोई तड़क भड़क नहीं होती लेकिन फिर भी ये एक अंतर को दर्शाते हैं एक सोच को दर्शाते हैं.
एक नज़र में देखते हैं की कैसे कुछ आइडल माने जाने वाले सितारे अपने प्रशंसकों को सही कामों के लिए प्रभावित नहीं करते, सबसे पहले एसआरके को लेते हैं जो की पेप्सी और अन्य कई विज्ञापनों में दिखते हैं अब उनका ये जिम्मा रणबीर कपूर ने ले लिया है इसके बाद अक्षय कुमार, इमरान खान और कई अन्य सितारे भी है जो ठन्डे से लेकर तेज़ रफ़्तार बाइक तक बेचते नज़र आ जायेंगे. तेज़ रफ़्तार बाइक बेचने वाले ये सितारे अपने प्रशंसकों से निवेदन भी करते हैं क़ी आप तेज़ रफ़्तार से बाइक न चलायें, अब भला ऐसा कैसे हो सकता है क़ी आप कुछ करें और आपके भक्त आपको भगवान् मानने वाले लोग तेज़ रफ़्तार बाइक न चलायें, दूसरा एसआरके जब एक विज्ञापन में कुछ बच्चों के साथ शहर क़ी सफाई करते नज़र आते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है लेकिन बाद में पता चलता है क़ी वो तो किसी प्रतिष्ठित कम्पनी के लिए पेंट बेच रहें हैं ऐसे ही कई और उदाहरण मिल जायेंगे. हृतिक रोशन पाउडर और साबुन भी बेचेंगे तो बर्फ क़ी घाटियों में इधर उधर छलांग लगायेंगे, कच्छा और बनियान बेचना है तो भी तलवार चलाएंगे.. और हमारे क्रिकेट के खिलाडी तो और गज़ब है कभी सैफ अली खान के पीछे कई-कई मंजिल क़ी छत और दीवार कूद जाते है लेकिन मैदान पर अगर बाल रोकनी हो तो हाथ उठा कर पीछे वाले को इशारा कर देते हैं (यह इसलिए लिखा है क्योंकि भारतीय टीम क्षेत्ररक्षण में फिसड्डी है ये बात सब जानते हैं ) और इसमें मास्टर ब्लास्टर भी शामिल हैं तो लगता है क़ी जब ये कर रहे है तो बाकियों को क्यों दोष दें.
अब उन विज्ञापनों क़ी बात करते हैं जिसमे नए और कुछ पुराने आइडल हैं लेकिन विज्ञापन में जितनी जान है देखकर मज़ा आ जाता है इनमें आमिर खान का महिंद्रा न महिंद्रा की बाज़ार में आई नयी मोटरसाईकल का विज्ञापन जिसे देख कर दिल खुश हो जाता है जिसमें अंत में आमिर कहते हैं की मेरे द्वारा किये गए सब स्टंट आप भी कर सकते हैं ..एक और विज्ञापन में दिग्गज भारतीय बोक्स़र विजेंद्र सिंह रक्त दान का विज्ञापन करते नज़र आते है तो देख कर अच्छा लगता है.. एक और विज्ञापन जिसमें भारतीय पहलवान सुशील कुमार नहाने जाते हुए बाल्टी लेकर जाने की बात करते हैं क्योकि फव्वारे में नहाने से पानी ज्यादा बर्बाद होता है. और ये बात एकदम सर्वविदित है की अगला विश्वयुद्ध पेट्रो पदार्थो को लेकर हो या न हो लेकिन पानी को लेकर होना तय है.. एक और स्टार है विवेक ओबराय जो की टीबी के मरीजो को सरकारी अस्पताल जाने की सलाह देता है और दावा को उसके पूरे समय तक खाने की हिफ़=दयत देता नज़र आता है .. और हां आमिर खान वाला वो विज्ञापन जिसमे शाहरुख़ खान की तरह वो भी शहर की सफाई पर ध्यान दिलाते हैं लेकिन जब वो शहर की सफाई की बात करते हैं तो अतिथि देवो भाव के साथ भारतीय पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करते है ..और कहते हैं की अगर सड़क पर गंदगी होगी, अगर हमारे पर्यटन स्थलों पर जहाँ तहां कूड़ा पड़ा होगा तो कोई क्यों और कैसे उनको देखने आएगा और हमारे देश में प्रेमी प्रेमिकाओं को और जगह मिले न मिले लेकिन एतिहासिक इमारतों पर अपना नाम लिख अमर हो जाने का विचार उनके दिमाग में खूब घर किये हुए है जैसे
पप्पू लव बसंती
चमेली लव पुत्तन
आई लव यू चंपा
मैं ये नहीं कहता कि ये लोग पैसा न लें,लेकिन इन्हें ये सोचना होगा कि पैसे के बदले ये समाज को देते क्या हैं??? आज हर चीज़ पर बाज़ार हावी है मैं ये खुद जानता हूँ. लेकिन जिन लोगों कि विज्ञापन के बाज़ार में मांग है उनकी कुछ जिम्मेदारी है अपने फैन्स के प्रति, समाज के प्रति, देश के प्रति.
Wednesday, August 17, 2011
और कितने आन्दोलन चाहती है सरकार
नमस्कार,
मुझे ऐसा लगता है कि २०१० और २०११ स्वतंत्रता के बाद के दो ऐसे सालों में दर्ज हो जायेंगे, जिनमें सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन और आन्दोलन हुए. २०१० से लेकर २०११ तक देश में कहीं न कहीं आंदोलनों या असफल आन्दोलनों का दौर जारी रहा है और अब भी जारी है. कुछ आन्दोलन थक कर बंद कर दिए गए तो कुछ को पुलिस ने दबा दिया कुछ के बारे में तो कहीं छपा तक भी नहीं तो कुछ इतने बड़े रहे क़ी उनके खर्चे पर ही सवाल उठा दिया गया. और इनकम टैक्स, कस्टम विभाग, पुलिस, सीबीआई और न जाने किन-किन विभागों को उनके पीछे लगा दिया गया.
लेकिन देखना यह है क़ी ये आन्दोलन या असफल आन्दोलन आखिर थे किस लिए..?? तो भैया ये थी आम आदमी क़ी जायज मांग- महंगाई कम कर दो, भ्रष्टाचार ख़त्म करना और भारत से बाहर जमा अवैध धन को वापस लाना. इन सारी मांगों पर हर कोई सहमत है क़ी ऐसा होना चाहिए. ऐसा मैं मानता हूँ. लेकिन अभी तक हुए आन्दोलनों में किसी को भी वह सफलता नहीं मिली जिसकी देश को जरूरत है.
ये आन्दोलनों या असफल आन्दोलनों का दौर बिलकुल वैसा ही है जैसा कि आज़ादी से पहले था जहां लगातार कोई न कोई पार्टी या संस्था प्रदर्शन या आन्दोलन कर रही होती थी. यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी आन्दोलनों को आम जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है. लेकिन इस सब के बावजूद कमी कहाँ रह जाती है तो इसका कारण जो मुझे समझ आया वह भी आज़ादी के पहले वाले कारणों से मिलता जुलता ही है. इन आन्दोलनों के असफल होने के पीछे दो महत्वपूर्ण कारण दिखाई देते हैं
१) आन्दोलनों की एकता में कमी
२) सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति
१) आन्दोलनों की एकता में कमी
पिछले दो सालों में हुए असफल या अर्धसफल आन्दोलनों जिनमे महंगाई, भ्रष्टाचार, अवैध धन, तिरंगा यात्रा, कश्मीर विरोधी लोगों के खिलाफ आन्दोलन या अन्य कई मुद्दों पर हुए आन्दोलनों का अंजाम ..ज्यादा कुछ सफल नहीं रहा. और ये बिलकुल वैसा ही है जैसे आज़ादी से पहले लाहौर, कोलकाता, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और देश के अन्य अन्य हिस्सों से अलग-अलग आन्दोलन एक ही उद्देश्य आज़ादी के लिए चला रहे थे. बिलकुल वैसे ही आज बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और अन्य संस्था और संगठन अपनी अपनी क्षमता के अनुसार भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ आन्दोलन चला रहे हैं..पर न जाने क्यूँ इन सबको एक छत के नीचे आने में क्या डर है इसका जवाब मुझे पता भी है और नहीं भी.. लेकिन यहाँ सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि यही कारण है की न आज़ादी से पहले के वो आन्दोलन सफल हुए थे और न आज वाले हो रहे हैं
२) सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति
देश में इतने सारे आन्दोलनों का जनसमर्थन के बावजूद यूँ.. असफल हो जाना आम बात नहीं है इसके पीछे सरकार का पूरा हाथ है. जैसा मुझे लगता है. यहाँ भी आप देखेंगे कि आज की हमारी सरकार और आज़ादी से पहले की ब्रिटिश सरकार ने एक जैसे तरीकों से आन्दोलनों का दमन किया. इसमें सबसे पहला तरीका है फूट डालो और राज करो की नीति उन्होंने भी अपनाई थी और अपनी सरकार ने भी.. पहले सरकार ने बाबा रामदेव को छोटा करने के लिए अन्ना को बड़ा बनाया, उसके बाद बाबा रामदेव के पीछे आरएसएस का हाथ बता उनके आन्दोलन के साम्प्रदायिक होने का प्रचार कर डाला, इसके बाद सरकार ने राम लीला मैदान में रामदेव के साथ क्या किया वो सबको पता है. अब अन्ना का नंबर था अन्ना को बड़ा बनाने वाली सरकार खुद फंस गयी और अब अन्ना उनके संभाले में नहीं आये तो उनके पीछे भी आरएसएस का हाथ बता उनकी टीम को बदनाम करना शुरू कर दिया.
अभी तक सरकार ने हर तरह से आन्दोलनों को दबाने की कोशिश की लेकिन इस बार अन्ना अड़ गए हैं अटल हैं और उन्हें पूरा जनसमर्थन भी मिल रहा है आगे क्या होना है ये देश को तय करना है की फेसबुक और ट्विटर पर लायिक कर समथन देना है या सड़क पर उतर कर समर्थन को जरुरत पड़ने पर क्रांति में बदलना है ??
Friday, May 20, 2011
इंजेक्शन है चक्काजाम
और दवाई ले आता है डॉ. कहता है इन्फेक्शन है इंजेक्शन लगाना पड़ेगा आदमी कहता है ठीक है डॉ.
इंजेक्शन लगा देता है और वह आदमी दो दिन में ठीक हो जाता है. सोचो अगर वह आदमी डॉ. के पास
नहीं जाता और इंजेक्शन नहीं लगवाता तो क्या होता...??? होता ये की वो खांसी धीरे-धीरे टीबी हो
जाती और फिर उस आदमी को है से था बना देती.
अब असल मुद्दे पर आते हैं जिसके लिए यह लेख लिखना शुरू किया था. अर्थात ये की अगर मैं बीजेपी द्वारा पेट्रोल
और दूध के दाम बढ़ाये जाने के विरोध में किये गए चक्का जाम को इंजेक्शन कहूँ तो गलत नहीं होगा. क्योंकि पिछले एक डेढ़ साल में जिस तरह से दूध और पेट्रोल के दाम बढ़े हैं वो चिंता का विषय है. सही बताऊँ तो दूध का तो कुछ ऐसा है की कुछ लोग अगर न भी पीएं तो चलता है लेकिन ऐसे भी लोग हैं जिन्हें बिना दूध पीये नींद ही नहीं आती, और साहब दूसरों का क्या कहूँ मुझे खुद भी नहीं आती. दूसरी और पेट्रोल है तो भैया इसकी माया तो ऐसी है की अगर ये महंगा होता है तो भैया निश्चित तौर पर खाने-पीने की हर चीज़ का महंगा होना तय है. क्योंकि पेट्रोल की वजह से आयात निर्यात, यातायात और आवाजाही के शुल्क में तेज़ी से वृद्धि होगी. जिसका असर फल-सब्जियों और आदि वस्तुओं पर पड़ना तय है और अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई का का ग्राफ ऊपर जाना निश्चित.
अब इन्ही पेट्रोल और दूध के दामों में हुई बढ़ोतरी को वापस लेने के लिए बीजेपी ने चक्का जाम किया, दिल्ली स्तर
के इस चक्का जाम में बीजेपी काफी हद तक सफल भी रही. और ये सब किया किसके लिए जनता के लिए क्योंकि
अंततः भला या बुरा जो भी होगा वो तो जनता का ही होगा. हाँ यह अलग बात है कि, और मैं इससे इनकार भी नहीं करूँगा की इस जनता की भलाई में राजनितिक फायदा भाजपा का है. तो इसमें भी क्या गलत है भाजपा लोकसभा में विपक्ष की भूमिका में भी तो है. तो इन मुद्दों पर धरना प्रदर्शन करना तो बनता ही है.
लेकिन मुझे आश्चर्य तब हुआ जब टीवी पर देखा की चक्का जाम के दौरान जो लोग जाम में फंसे थे वे कह रहे थे
की यह ठीक है की जनता पेट्रोल और दूध के दाम बढ़ने से परेशान है लेकिन इस चक्का जाम से भी तो आम जनता ही परेशान हो रही है. दूसरी तरफ टीवी पर जो रिपोर्टर साहब थे वो कह रहे थे की एक विरोध पिछले दिनों अन्ना हजारे ने किया था जिससे किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई और एक विरोध ये है. तो मैं कहूँगा की अन्ना जी ईमानदार व्यक्ति हैं मैं उनका सम्मान भी करता हूँ लेकिन उनके अनशन से क्या फायदा हुआ मुझे अभी तक नज़र नहीं आया. जो कमेटी गठित की गयी है उसमे दो अध्यक्ष हैं, लोकपाल बिल भी जस का तस पास हो जायेगा मुझे इस पर १००% शक है.
हो सकता है अन्ना जी के अनशन का दूरगामी फायदा हो लेकिन यदि हम उस प्रक्रिया को दूध और
पेट्रोल की कीमतों को कम करने पर भी अपनाएँ तो ६ महीने कमेटी के गठन में, ६ महीने बहस में और
६ माह पेट्रोल और दूध के दामों के मूल्य निर्धारण में लगेंगे और तब तक जो महंगाई नहीं झेल पाया
वो मर जायेगा और जो झेल पायेगा उसे इसकी आदत पड़ जायेगी और दाम फिर बढ़ा दिए जायेंगे.
और इस प्रकार ये खांसी धीरे-धीरे टीबी बन हम सबको खा जायेगी. अब विचार आप कीजिये की अच्छा क्या है
इंजेक्शन या टीबी ????
Wednesday, April 27, 2011
कॉलमों में बंटा पत्रकार (प्रिंट)
समाचार पत्र में काम करने वाले व्यक्ति की मानसिकता और उसकी सोच धीरे-धीरे उसे प्रत्येक घटना और ऐसा कोई भी घटना क्रम जो एक प्रिंट पत्रकार के सामने घटित होता है उसे लेकर प्रिंट मीडिया में काम करने वाले व्यक्ति का अपना एक नजरिया विकसित होता है या होता चला जाता है
फिर वह प्रिंट पत्रकार आम व्यक्ति नहीं रहता वह मशीन हो जाता है कुछ हद तक, जो किसी भी खबर या घटनाक्रम को अखबार या मैगजीन छापने के लिए उसका आंकलन भावनात्मक रूप में करना छोड़ देते हैं. ऐसा तब ज्यादा होता है जब उस पत्रकार को लगभग पिछले डेढ़ महीने से छुट्टी नहीं मिली हो, नए एडिसन लॉन्च करने के चक्कर में चार वीक ऑफ़ भी नहीं मिलें हो. यहाँ तक की आपके पेज का समय १२ की जगह १:३० हो गया हो और छोड़ते छोड़ते २ बजे और घर पहुँचते-पहुँचते तीन. तो ऐसा ज्यादा जल्दी होता है और आपका जीवन अखबारमय होने लगता है. ऐसा इसलिए भी हो सकता है की आप अपने काम के साथ ही एन्जॉय करने की कोशिश करने लगते हैं जिससे छुट्टी न मिलने पर काम बोझ न बने.
अब आप देखिये की किन ख़बरों और घटनाक्रमों को किस मानसिकता से लिया जाता है दो बहुत ताज़ा और बहुत छोटे उदाहरण देता हूँ :-
१) रात के २:४५ कैब से घर जाते समय अक्षरधाम मंदिर के सामने कंटेनर ट्रक पलटा हुआ देखा तो अनायास ही कैब में आगे की शीट पर बैठे सर के मुंह से निकला की अरे फोटो खींच लो और फिर अगली लाइन मेरी थी की लो एक और "सिंगल कॉलम" और अगर समय दिन का होता तो शायद "डीसी" (डबल कॉलम) या "टीसी" (तीन कॉलम) होती क्योंकि फिर खबर के साथ पलटे हुए कंटेनर के पीछे लगे जाम का फोटो भी होता.
२) सत्य साईं बाबा की मृत्यु के बाद अखबार ने एक पूरा पेज बाबा को समर्पित किया. तो ऑफिस में बैठे बात करते हुए अचानक ख्याल आया की जब बाबा की तबियत ख़राब हुई उस दिन बाबा सिंगल कॉलम थे, तबीयत थोड़ी बिगड़ी तो डीसी और टीसी हो गए वो भी फोटो के साथ और अपने अंत के साथ अंततः बाबा पूरा पेज हो गए. तो भाई लोगों इसे कहते हैं
"जिन्दा हाथी लाख का
मरा सवा लाख का "
अखबार का ऑफिस एक अजीब जगह होती है जहाँ ख़बरों के चक्कर में अक्सर ऐसा होता है, आप ही बताएं आपको कैसा लगेगा अगर आपको को सुनने को मिले की बस खाई में गिर गयी है और इस हादसे में ४ बच्चों सहित १० लोगों की जान चली गयी. आपके लिए ये एक दुखद घटना है और सामान्य रूप से पत्रकार के लिए भी लेकिन जब पत्रकार ऑफिस में होता है तो इसी खबर को कहता है की "एक बड़ी और अच्छी खबर आई है लीड बनाओ" और जानते हैं यह सब कब होता है यह तब होता है जब आधी दुनिया सो रही होती है और पत्रकार अखबार छापने क़ी आपाधापी और ढेर ख़बरों में से ख़बरों के चयन में लगा होता है अन्दर ऑफिस की जगमगाती लाइटों के बीच उसे याद भी नहीं होता की दिन नहीं रात है.
टूटता है कॉलम
लेकिन इस सब के बाद भी पत्रकार, इंसान ही रहता है और कई बार ऐसा कुछ हो जाता है की कॉलमों में बंटा पत्रकार अचानक इंसान हो जाता है और उसे भावना और दर्द दोनों चीज़ों का अर्थ समझ आ जाता है छोटा सा उदाहरण :-
पिछले दिनों धौलाकुआँ स्थित दक्षिण परिसर के कॉलेज रामलाल आनंद की एक छात्रा की गोली मार कर हत्या कर दी गयी,.. मैंने भी उसी कॉलेज से पढ़ाई की है तो उस लड़की को जनता भर था,.. या कहूँ की उस लड़की से मौकापरस्त दोस्ती थी मतलब काम की दोस्ती वो भी सिर्फ इस लिए की मेरा दोस्त चुनाव लड़ रहा था तो वोट लेने के चक्कर में सबसे बात करनी होती थी.. जिनमें वो लड़की "राधिका" भी थी लेकिन उस लड़की की हत्या की खबर जब मुझे ही पढ़ने को मिली और मेरे ही पेज पर मैंने ही लगायी, तो न जाने दिमाग में क्या चल रहा था.. मुझे ठीक से याद भी नहीं, पर कुछ था जरूर जिसने करीब उस पूरी रात तो मुझे बेचैन रखा..अन्दर कहीं उसका चेहरा और उसकी मुझसे दो साल कम उम्र कहीं न कहीं घूमती ही रही.. दिमाग कॉलमों में तो उस दिन भी बंटा लेकिन एक अजीब सी कशमकश साथ थी..
मैंने ऊपर सत्य साईं बाबा के निधन का पर जो कमेन्ट किया है यदि उस से किसी को दुःख हुआ है तो क्षमा प्रार्थी हूँ , शायद में ऐसा इसलिए लिख पाया क़ी में भी एक पत्रकार बनने क़ी प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा हूँ
Friday, April 1, 2011
रोटी महंगी गाड़ी सस्ती : ये भी कोई बात हुई
गाड़ी सस्ती करने का कोई भी तर्क मेरी समझ से बाहर रहा है. और क्योंकि मैं कोई बुद्धिजीवी नहीं हूँ तो अर्थव्यवस्था का मैथ मैटिक जरा कम ही समझ आता है.. लेकिन फिर भी जिस देश में एक भी आदमी भूखा सोता है उस देश में यदि आप गाड़ियाँ सस्ती करते है तो यह मेरी समझ से बाहर है.
इस बारे में अगर आपने किसी से सवाल कर लिया तो वो कहेगा की देश तरक्की कर रहा है और गरीबी घट रही है. लेकिन सच मानिये मुझे ऐसा नहीं लगता.. क्योंकि हमारे यहाँ तो गरीबी नापने का पैमाना ही गलत बनाया गया है अभी जो पैमाना काम कर रहा है वो यह है की गाँव में यदि कोई व्यक्ति ३०० रुपये प्रतिमाह कमाता है तो वह गरीबी रखा से ऊपर माना जायेगा. दूसरी और शहरों में यह पैमाना ६०० रुपये रखा गया है की यदि शहर में किसी की प्रति व्यक्ति आय ६०० रुपये प्रति माह है तो आप गरीबी रेखा से ऊपर है.. तो आप मुझे एक बात बताएं की जिन लोगों ने यह पैमाना निर्धारित किया है वह खुद तो एक वक़्त के नाश्ते पर १००० रुपये से ज्यादा खर्च करते हैं .. और पैमाना कुछ ऐसा बनाया है की मिल जाये तो सच में इतनी चप्पल मारूंगा की सारे अर्थव्यवस्था का 'अ' भी भूल जाए..
क्या कोई तरीका नहीं निकला जा सकता की पहले गरीबी को जड़ से ख़त्म किया जाये हमारी जनसँख्या लगातार बढ़ रही है और इसी के साथ गरीबी भी .. पिछले दिनों एक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक ७७% भारतीय प्रतिदिन २० रुपये से अपना गुज़ारा चलाते हैं इन अर्थव्यवस्था के नीतिनिर्धारकों से कोई ये पूछे की क्या तुम्हारे बच्चे २० रुपये की जेब खर्च अपना प्रतिदिन का काम चला लेते हैं जो आपने ऐसी निति बनाकर छोड़ी है. तो यहाँ कुछ ऐसा नहीं हो सकता की हम पहले अपने देश की गरीब जनसंख्या को जो की बीपीएल के अंतर्गत आती है उसे माध्यम वर्गीय बनाने का प्रयास करें और जितनी भी निजी कम्पनियां हैं उनसे भी इस और कदम बढाने की अपील की जाये. और यह सब बड़े और ऊँचे स्तर पर हो जिससे की बड़ी निजी कंपनियों पर असर पड़े,.. मैंने ११ वीं कक्षा में राजनीति विज्ञानं में थोडा सा पढ़ा था की राज्य को कल्याणकारी कार्य करने चाहिए. तो यहाँ राज्य और सरकार को कल्याणकारी बनकर कार्य करने की जरूरत है.
सरकार को निजी कंपनियों को सिर्फ यह समझाना होगा की कुछ दिन कल्याण कारी बनकर कार्य करें और जैसे ही सबको अच्छे से रोटी और उसके बाद कपडा और मकान मिल जाये तो गाड़ियों के दाम भी बढ़ाये जायेंगे और इस बार जब आप गाड़ियों के दाम बढ़ायेंगे तो आपके पास एक अच्छा और बड़ा मध्यमवर्ग होगा जो गाड़ियों को खरीदने का इच्छुक होगा.. इससे विकास भी होगा और शिकायतें कम होंगी और करना सिर्फ इतना होगा की थोड़ा सा धैर्य रखते हुए थोड़ा सा कल्याणकारी होते हुए .. इमानदारी से कार्य करने होंगे.
Sunday, February 20, 2011
अपने हिस्से की देशभक्ति - २
- पिछली पोस्ट से आगे ...
देश भक्ति दिखनी भी चाहिए :-
मैंने कई बार देखा है (और देखा क्या है मैं खुद भी कुछ हद तक इसी में शामिल हूँ) युवा अगर पार्टी में जाते हैं तो डीजे पर बज रहे फ़िल्मी गाने को जोर जोर से गाने में नहीं हिचकते लेकिन वही युवा अगर किसी धर्म संस्कृति के काम जैसे भजन कीर्तन या जागरण में हो यहाँ तक की कुछ तो अपने घर में ही हो रहे कथा-हवन में हिस्सा लेने में कतराते हैं या फिर किसी सामाजिक मुद्दे को लेकर मार्च, जुलूस या प्रदर्शन हो तो वहाँ नारे लगना स्वाभाविक है अगर आप कीर्तन या जागरण में है तो 'जय माता दी' भगवान् शिव या राम और कुछ भी जयघोष या आप किसी मार्च, जुलूस या प्रदर्शन में है तो 'वन्दे मातरम' या भारत 'माता कि जय' या कुछ और तो युवा या तो इनमे हिस्सा ही नहीं लेते और भगवान कि दया से ले भी लिया तो अपनी बातों में मशगूल रहेंगे पर नारे नहीं लगायेंगे ना जाने क्यों शर्म आती है मेरा ऐसा मानना है की जब आप शामिल हो ही गए है तो मन से नारे या जयघोष लगायें. और मैं शादी या किसी भी कार्यक्रम में फ़िल्मी गाने गाने के लिए मन नहीं कर रहा हूँ.
इम्पोर्टेड है तो बढ़िया है वाली मानसिकता :-
आज लोगों के दिल में ये बात घर कर गयी है कि बाहर बनने वाली हर चीज अच्छी होती है चाहे फिर वो कुछ भी हो हर छोटी से छोटी चीज़ इम्पोर्टेड ही चाहिए जैसे कपडे, साबुन, दंतमंजन, मोटर साईकल, कार, घड़ी या और कुछ भी, हम कुछ भी स्वदेशी इस्तेमाल करना ही नहीं चाहते. हमें घर में आने वाली हर छोटी चीज़ विदेशी चाहिए चाहे वो कुछ भी हो, कुछ चीज़ों को छोड़ दें तो बाज़ार में स्वदेशी और अच्छी चीज़ें आराम से मिल जाती हैं और मैं तो कहूँगा की अगर इसके लिए कुछ पैसे ज्यादा खर्च करने हो तो करेंगे, लेकिन ऐसा कम ही होता है कि स्वदेशी चीज़े महंगी हो.
एक उदाहरण है :- आज कोलगेट के विज्ञापन में जो दिखाया जा रहा है ‘कि क्या आपके पेस्ट में नमक है ?’ कोई जाकर इन्हें ये बताये की भारत के सबसे पिछड़े गाँव में जहाँ स्कूल भी नहीं होगा वहां भी लोग यह बात बता देंगे की नमक से दांत साफ़ करना कितना लाभकारी है और जितने भी लोग ये पढ़ रहे हैं उन्होंने अपने गाँव में या यहीं शहर में दांत में दर्द होने पर माँ या पिताजी के कहने पर हल्दी नमक को मिला कर दांतों पर रगड़ा होगा और ये बात आज हमें कोलगेट वाले बताएँगे. और मजेदार तो ये है की लोगों ने उनकी बात मान खरीद भी लिया, लेकिन अपने घर वालों कि बात मान कभी नमक या राख से दांत साफ़ नहीं किये होंगे ये हमारी ही कमी है कि विदेशी है इम्पोर्टेड है तो बेहतर है.
पढ़ाई के लिए या पढ़ाई के बाद विदेश :-
आज कल ना जाने कहाँ से ये सोच विकसित हो गयी है कि भारत में अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कि जा सकती और युवा विद्यार्थी विदेशों का रुख करने लगे हैं मुझे इससे ज्यादा दिक्कत तब होती है जब आप पढने गए और वही के हो के रह गए. और वहां जा कर कहते हैं कि भारत रहने लायक जगह नहीं है वहां दकियानूसी और रूढ़ीवादी विचार वाले लोग रहते हैं, मन तो करता है गोली मार दूँ ऐसे लोगो को. लेकिन इससे भी ज्यादा गुस्सा तब आता है जब अपने ही देश के कुछ विद्यार्थी यहीं से शिक्षा प्राप्त कर प्लेसमेंट में विदेशी कम्पनियों से मिले बड़े पैकेज पर इतराते हुए विदेश भाग जाते हैं और कहते हैं भारत कभी तरक्की नहीं कर सकता. भारत ने आपको इतना बड़ा बनाया कि आपकी मांग विदेशों में भी है. और आपने भारत को ही लात मार दी क्यों आपने यह जिम्मा अपने सर नहीं लिया कि कुछ दिन कम पैसों में काम करेंगे पर देश में रहकर देश के लिए ही काम करेंगे, देश कि तरक्की के लिए काम करेंगे . मैं तो चाहता हूँ कि कानून बना देना चाहिए उच्च शिक्षा लेने के बाद कम से कम 7 या 10 साल आप कहीं बाहर काम नहीं कर सकते. आपको अपने ही देश में काम करने होगा आपको अच्छा पैसा भी मिलेगा ऐसा नहीं है कि मुफ्त में आपको घसीटा जायेगा. लेकिन ये बहुत मुश्किल है.
ये सभी बातें कुछ लोगों को अजीब लगेंगी लेकिन ये सच है आप बिना बोर्डर पर जाये भी इसी तरह के कुछ और काम कर अपनी देशभक्ति दिखा सकते हैं बस कुछ बातों का ध्यान रखना होगा और बस हो गया. शाहरुख़ खान अभिनीत चक दे इंडिया का ये डायलोग आज भी मुझे याद है कि मैदान में खेलते समय पहले देश के लिए खेलो फिर अपनी टीम के लिए और अगर फिर भी कुछ जान बच जाए तो अपने लिए, उसी तरह मैं मानता हूँ कि हम पढ़ाई देश के लिए करते हैं फिर समाज के लिए और फिर अपने परिवार के लिए.
बाकी रही बोर्डर पर लड़ने कि बात तो उसके लिए भी तैयार रहना चाहिए. अमेरिका में २ साल की आर्मी ट्रेनिंग अनिवार्य है क्या भारत में ऐसा नहीं हो सकता??, लेकिन एक बार एम टीवी पर एक पोल हुआ था कि क्या अमेरिका की तरह यहाँ भी ट्रेनिंग को अनिवार्य नहीं किया जा सकता?? तो सिर्फ ५२% लोगों का जवाब हां था जबकि एम टीवी एक युवा फेम चैनल है इसी पर कवि हरिओम पवार कि पंक्तियाँ कुछ यूँ हैं :-
क्या ये देश उन्ही का है जो युद्धों में मर जाते हैं,
अपना शीश कटा कर के सरहद को पार कर जाते हैं,
ऐसा युद्ध वतन कि खातिर सबको लड़ना पड़ता है,
संकट कि घड़ियों में सबको सैनिक बनना पड़ता है,
ये गाथा, उनको सूरज कि लाली में रख देती है,
और हाड़ा रानी शीश काट कर थाली में रख देती है
Wednesday, February 9, 2011
अपने हिस्से क़ी देशभक्ति
लेकिन क्या सिर्फ फौजियों के देश भक्त होने से काम चल जायेगा, हमारा कोई फ़र्ज़ नहीं देश के प्रति रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी कविता परशुराम की प्रतीक्षा में कहा है की
'‘हम दें उस को विजय, हमें तुम बल दो,
दो शस्त्र और अपना संकल्प अटल दो।
हों खड़े लोग कटिबद्ध वहाँ यदि घर में,
है कौन हमें जीते जो यहाँ समर में ?’'
मैं राम धरी सिंह दिनकर की इस भावना को जीने की बात कर रहा हूँ. तो देश भक्त होने के लिए आपको जो सबसे पहले होना चाहिए वो है ईमानदार. आपको देश भक्त होने के लिए बोर्डर पर जाकर गोलियां चलने की जरूरत नहीं है देश भक्त होने के लिए आपको सिर्फ इतना करना होगा कि आप जो भी कार्य करें उसे इमानदारी से करें. आप जहाँ भी काम करते हैं बस उस काम को इमानदारी से करे. हमारे देश में सरकारी कर्मचारियों पर एक लांछन लगा है कि आपकी सरकारी नौकरी लग गयी है अब आप सरकारी दामाद हो गए. आप उतना काम नहीं करते जितना सरकार आपका ध्यान रखती है. सरकारी नौकरी करने वाले अक्सर ऐसा करते है :-
कार्यालय पहुँचाने पर उन्हें याद आता है कि उन्होंने बिजली का बिल जमा नहीं किया तो हाजिरी लगाने के बाद काम करने बजाये ऑफिस के समय में आप बिल भरते हैं.
कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों ये लोग अपना काम ईमानदारी से पूरे समय तक नहीं करते ? कई बार मैं अपने या घर के किसी काम से बैंक जाता हूँ तो देखता हूँ की बैंकिंग का समय तो ९:३० से शुरू होता है. लेकिन ९:३० बजे बैंककर्मी आते ही हैं जिससे सुबह ऑफिस जाने वालों को देर होती है ऐसा एक बार हो तो चलता है लेकिन एक तो ये रोज़ कि कहानी है दूसरा बैंक में लेट होने के कारण अन्य जगह काम करने वाले लेट होते हैं और फिर ये एक चैन बन जाती है. जो कि लेट लतीफी कि आदत डालती है
ईमानदारी का दूसरा पहलू भी है
१) क्या आप अपना आयकर सही जानकारी और सही समय पर भरते है?
२) क्या इसी प्रकार के अन्य कर भी जो देने जरूरी हैं उन्हें भरते हैं ?
३) क्या आप सड़क पर गाड़ी चलाते समय रेड लाईट के दिशा निर्देशों का पालन करते हैं?
४) क्या आप मोटर साईकल चलाते हुए हेलमेट का प्रयोग बिना पुलिस वाले रास्तों पर भी करते हो ?
५) क्या आप अपना फ़ोन, पानी, बिजली बिल समय पर भरते है ?
६) क्या आप पानी और बिजली का सही इस्तेमाल करते हैं ? आदि आदि
हम अपनी जिम्मेदारी को यह कह कर नहीं टाल सकते कि सरकार है वो करेगी. जहाँ लोग जागरूक नहीं होते वहां सरकारें भी लापरवाह होती हैं आज देश में भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है उसके पीछे भी कुछ हद तक हमारा ही हाथ है पानी का बिल भरने गए और लाइन लम्बी मिली तो हमने १० रूपये देकर काम करा लिया या फिर बिना हेलमेट लगाये जा रहे हैं और पुलिस ने पकड़ लिया तो भी हम २० -५० देकर निकल जाते हैं लेकिन इससे हुआ ये की अब उन्हें आदत हो गयी वो बिना २०-५० लिए काम करते ही नहीं है. और अब तो १० से काम चलता ही नहीं है अब १० की जगह धीरे धीरे दाम भी बढ़ रहा है सिर्फ १० से गुजरा नहीं होता और काम के ५०, १००, ५०० तक लिए जाते हैं कहावत मशहूर है 'सरकारी ऑफिस में काम करना है तो चपरासी को पटा लो' काम जल्दी हो जाता है. इस भ्रष्टाचारी शासन पर दो लाइन राम धारी सिंह दिनकर जी कि :-
'जा कहो, पुण्य यदि बढ़ा नहीं शासन में,
या आग सुलगती रही प्रजा के मन में;
तामस बढ़ता यदि गया ढकेल प्रभा को,
निर्बन्ध पन्थ यदि मिला नहीं प्रतिभा को,
रिपु नहीं, यही अन्याय हमें मारेगा,
अपने घर में ही फिर स्वदेश हारेगा।'
शेष अगली पोस्ट में
Saturday, January 8, 2011
अनुभव सोच+आलय का..
और हाँ अब यहाँ कुछ ऐसा होगा जो शायद लेखों के इतिहास में पहली बार हुआ होगा मतलब लेख शुरू होने के 6 लाइन बाद ही लेख का शीर्षक बदल रहा हूँ और ये इसलिए की मैं थोडा कन्फ्यूज़ था इन दोनों शीर्षकों को लेकर तो दोनों ही रख दिए!
तो अब मैं अपना वो अनुभव लिख रहा हूँ जो बहुत से लोग दूसरों के सामने बोलने में भी शर्माते हैं अनुभव 'सोच+आलय' का –
'सोच+आलय' में घुसते ही न जाने कहाँ से दिमाग में आया की अपने देश की संसद (पार्लियामेंट) और पड़ोसी देश पकिस्तान में ज्यादा अंतर नहीं रह गया है .
पाकिस्तान =पार्लियामेंट ---???
इसी सोच को आगे बढाते हुए मैंने सोचा की पड़ोसी देश पाकिस्तान आतंकवाद फैला कर हमारे देश में धन और जन की हानि लगातार बनाये रखता है वहीँ दूसरी और हमारी पार्लियामेंट यानी भारतीय संसद ने पिछले २ सालों से महंगाई को लगातार रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ाकर मध्यम वर्गीय जनता के धन पर डाका तो डाला ही है वहीँ गरीब की तो जान पर ही बन आई है फिर जैसे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री आतंकवाद रोकने और उसमे कमी लाने के बयान बार बार जारी करते है पर होता कुछ नहीं है वैसे ही आपको अपनी संसद में वित्तमंत्री प्रणब दा और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह महंगाई पर काबू पाने उसे रोकने और मूल्य वृद्धि कम करने के लिए बयान जारी करते दावा करते लगातार नज़र आयेंगे है लेकिन होता कुछ नहीं है महंगाई भी बढती है और आतंकवाद भी.
फिर ख्याल आया की जैसे कश्मीर के हालात बने हुए हैं जहाँ पत्थरबाजों को पत्थरबाजी करने के लिए १०० रुपये प्रतिदिन दिया जा रहा है और पत्थर भी उपलब्ध कराये जा रहे हैं और ये सारा पैसा पाकिस्तान से आता है जिससे की कश्मीर में अशांति बनी रहे और यह सब सिर्फ कश्मीर को कब्जाने की साजिश के चलते किया जा रहा है. पाकिस्तान कश्मीर को तोड़कर पकिस्तान में मिलाना चाहता है और इसके लिए स्वतंत्रता के बाद से अब तक छल और बल सभी प्रकार के प्रयोग करता आ रहा है. दूसरी और भारतीय संसद पाकिस्तान का साथ देती नज़र आती है क्योंकि संसद की ही कमजोर और उपेक्षाकारी नीतियों के कारण कश्मीर में अलगाववादियों की आवाज़ इतनी बुलंद हो रही है. यही नहीं संसद की इन्ही महानगर केन्द्रित नीतियों को अपनाने के कारण ही आज कश्मीर से अलग भी भारत के कई हिस्से जिनमें बुंदेलखंड , गोरखालैंड , विदर्भ और वर्त्तमान में बहुप्रचलित तेलंगाना और अन्य कई क्षेत्र अलग राज्य बनने की मांग करने लगे है .
अर्थ नीति की और ध्यान गया तो याद आया की जैसे पाकिस्तान भारत में नकली करेंसी को फैला कर देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ना चाहता है और भी कई तरीको से भारत को आर्थिक क्षति पहुंचाता है उसी प्रकार अपनी संसद में बैठे लोगों द्वारा बनाई जाने वाली थकी हुई और बूढ़ी नीतियों से देश की अर्थव्यवस्था कमजोर तो हुई ही है दूसरी और हमारे माननीय संसद में बैठने वाले मंत्री गणों द्वारा विदेशी बैंकों जमा किया गया पैसा भी हमे गरीबी और भ्रष्टाचारियों की श्रेणी में भी हमें अच्छा ख़ासा स्थान दिलाये हुए है . अगर बैंक में पैसा जमा करने वालो के नामों का खुलासा हो जाये तो पता चल जाये की कौन कौन पाकिस्तानी निगम पार्षद , विधायक और सांसद है जो भारत को पाकिस्तान की तर्ज़ पर खोखला करने में लगे हैं.
फिर मैं कभी कभी देश की रक्षा के विषय में भी सोच लेता हूँ तो इस बार सोचालय में भी देश की चिंता हुई आखिर मैं खुद को सच्चे देश भक्तों में गिनता हूँ . छोड़ो मेरी बात फिर कभी करेंगे अभी पाकिस्तान और पार्लियामेंट को पकड़ते हैं तो यहाँ भी पड़ोसी पाकिस्तान और अपनी पार्लियामेंट कुछ कुछ एक जैसे ही है अब आप ही देखिये पाकिस्तान पिछले कई सालों से अपना रक्षा बजट में हर साल वृद्धि कर रहा है सब जानते है वो किसके लिए परमाणु हथियारों को जमा कर रहा है और इसी सब के चलते पाकिस्तानी बिल्ली पूरी शक्ति से भारत की दिल्ली को आँखे दिखा रही है . दूसरी और अपनी संसद है जहाँ पिछले कई सालों से रक्षा बजट घट तो रहा ही है बल्कि जो दिया जाता है उसमे से भी कुछ वापस आ जाता है ऐसा करने के दो कारण हो सकते है एक तो हम पाकिस्तान को बराबरी का मौका देना चाहते हैं और दूसरा की हम विश्व शक्ति का पद प्राप्त कर चुके हैं और अब हमें अपने सैनिकों और सीमाओं पर कुछ ज्यादा खर्चा करने की जरूरत नहीं है पर किसी को यह ध्यान नहीं है की पता नहीं क्यों पिछले कई सालों से सैनिक आत्म हत्या आर रहे है.
अब मेरे दिमाग ने और तेज़ दौड़ना शुरू किया और ताज़ा मुद्दे और 'अपने' कश्मीर के मुख्यमंत्री के बयान पर ध्यान गया जो कहतें हैं की अगर लाल चौक पर तिरंगा फहराने के बाद कोई दंगा होता है या घाटी में उबाल आता है या अशांति होती है तो उसके लिए बीजेपी खुद जिम्मेदार होगी. और बीजेपी को चेतावनी दी है की लाल चौक पर तिरंगा न फहराए. इस बार हुर्रियत के एक नेता ने बीजेपी को लाल चौक पर तिरंगा फहराने की चुनौती पाकिस्तानी तर्ज़ पर दी है और इस पर फारूक अब्दुल्ला और उनके मुख्यमंत्री साहबजादे उन अलगाववादियों का साथ देते नज़र आते हैं और तिरंगा फहराने के बीजेपी के कार्यक्रम को टालने की नसीहत दे रहे हैं जैसा की पकिस्तान चाहता है और इस पर भी कांग्रेसनीत केन्द्र सरकार चुप है तो मुझे यकीन हो गया की पाकिस्तान =पार्लियामेंट! मतबल दोनों में कोन्हो अंतर नहीं है भैया और इस मुद्दे पर लिखने और कहने को बहुत कुछ है पर फिर कभी कहूँगा और लिखूंगा क्योंकि मुझे याद आ गया है की मैं 'सोच+आलय' में बैठा हूँ और अब ज्यादा देर नहीं बैठ सकता तो भाइयों मैंने यदि इसमें कुछ गलत लिखा है तो अपने कमेन्ट में जरूर लिख दे क्योंकि अपनी कमियां देखना ज्यादा जरूरी है खाली पाकिस्तान को गाली देने से कुछ नहीं होगा पहले घर के गद्दारों का मिटना बहुत जरूरी है और अब मैंने फ्लश मार दिया है फील कीजियेगा .....
नोट : ये लेख लेखन कला के सभी नियमों को तोड़ता सा प्रतीत होता है जो लोग मेरी शैली पर मुझे डांटना चाहें डांट सकते हैं