Wednesday, August 17, 2011

और कितने आन्दोलन चाहती है सरकार

नमस्कार,
मुझे ऐसा लगता है कि २०१० और २०११ स्वतंत्रता के बाद के दो ऐसे सालों में दर्ज हो जायेंगे, जिनमें सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन और आन्दोलन हुए. २०१० से लेकर २०११ तक देश में कहीं न कहीं आंदोलनों या असफल आन्दोलनों का दौर जारी रहा है और अब भी जारी है. कुछ आन्दोलन थक कर बंद कर दिए गए तो कुछ को पुलिस ने दबा दिया कुछ के बारे में तो कहीं छपा तक भी नहीं तो कुछ इतने बड़े रहे क़ी उनके खर्चे पर ही सवाल उठा दिया गया. और इनकम टैक्स, कस्टम विभाग, पुलिस, सीबीआई और न जाने किन-किन विभागों को उनके पीछे लगा दिया गया.
लेकिन देखना यह है क़ी ये आन्दोलन या असफल आन्दोलन आखिर थे किस लिए..?? तो भैया ये थी आम आदमी क़ी जायज मांग- महंगाई कम कर दो, भ्रष्टाचार ख़त्म करना और भारत से बाहर जमा अवैध धन को वापस लाना. इन सारी मांगों पर हर कोई सहमत है क़ी ऐसा होना चाहिए. ऐसा मैं मानता हूँ. लेकिन अभी तक हुए आन्दोलनों में किसी को भी वह सफलता नहीं मिली जिसकी देश को जरूरत है.
ये आन्दोलनों या असफल आन्दोलनों का दौर बिलकुल वैसा ही है जैसा कि आज़ादी से पहले था जहां लगातार कोई न कोई पार्टी या संस्था प्रदर्शन या आन्दोलन कर रही होती थी. यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी आन्दोलनों को आम जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है. लेकिन इस सब के बावजूद कमी कहाँ रह जाती है तो इसका कारण जो मुझे समझ आया वह भी आज़ादी के पहले वाले कारणों से मिलता जुलता ही है. इन आन्दोलनों के असफल होने के पीछे दो महत्वपूर्ण कारण दिखाई देते हैं
१) आन्दोलनों की एकता में कमी
२) सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति
१) आन्दोलनों की एकता में कमी
पिछले दो सालों में हुए असफल या अर्धसफल आन्दोलनों जिनमे महंगाई, भ्रष्टाचार, अवैध धन, तिरंगा यात्रा, कश्मीर विरोधी लोगों के खिलाफ आन्दोलन या अन्य कई मुद्दों पर हुए आन्दोलनों का अंजाम ..ज्यादा कुछ सफल नहीं रहा. और ये बिलकुल वैसा ही है जैसे आज़ादी से पहले लाहौर, कोलकाता, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और देश के अन्य अन्य हिस्सों से अलग-अलग आन्दोलन एक ही उद्देश्य आज़ादी के लिए चला रहे थे. बिलकुल वैसे ही आज बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और अन्य संस्था और संगठन अपनी अपनी क्षमता के अनुसार भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ आन्दोलन चला रहे हैं..पर न जाने क्यूँ इन सबको एक छत के नीचे आने में क्या डर है इसका जवाब मुझे पता भी है और नहीं भी.. लेकिन यहाँ सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि यही कारण है की न आज़ादी से पहले के वो आन्दोलन सफल हुए थे और न आज वाले हो रहे हैं
२) सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति
देश में इतने सारे आन्दोलनों का जनसमर्थन के बावजूद यूँ.. असफल हो जाना आम बात नहीं है इसके पीछे सरकार का पूरा हाथ है. जैसा मुझे लगता है. यहाँ भी आप देखेंगे कि आज की हमारी सरकार और आज़ादी से पहले की ब्रिटिश सरकार ने एक जैसे तरीकों से आन्दोलनों का दमन किया. इसमें सबसे पहला तरीका है फूट डालो और राज करो की नीति उन्होंने भी अपनाई थी और अपनी सरकार ने भी.. पहले सरकार ने बाबा रामदेव को छोटा करने के लिए अन्ना को बड़ा बनाया, उसके बाद बाबा रामदेव के पीछे आरएसएस का हाथ बता उनके आन्दोलन के साम्प्रदायिक होने का प्रचार कर डाला, इसके बाद सरकार ने राम लीला मैदान में रामदेव के साथ क्या किया वो सबको पता है. अब अन्ना का नंबर था अन्ना को बड़ा बनाने वाली सरकार खुद फंस गयी और अब अन्ना उनके संभाले में नहीं आये तो उनके पीछे भी आरएसएस का हाथ बता उनकी टीम को बदनाम करना शुरू कर दिया.
अभी तक सरकार ने हर तरह से आन्दोलनों को दबाने की कोशिश की लेकिन इस बार अन्ना अड़ गए हैं अटल हैं और उन्हें पूरा जनसमर्थन भी मिल रहा है आगे क्या होना है ये देश को तय करना है की फेसबुक और ट्विटर पर लायिक कर समथन देना है या सड़क पर उतर कर समर्थन को जरुरत पड़ने पर क्रांति में बदलना है ??

1 comment:

  1. देरी के लिए माफ़ी...भाई अब विभिन्न क्षेत्रो से जुड़े लोग तुष्टिकरण की नीति के पार आ चुके है, अतः समय-समय पर आन्दोलन का हथियार थाम रहे है.सरकार सुनने को तैयार नही अतः आन्दोलन करना एक फैशन सा बन गया है,जरुरत बन गया है.

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