Wednesday, July 26, 2017

नामकरण में चूक गई योगी सरकार

नामकरण में चूक गई योगी सरकार 


कुछ दिन पहले सैफीना को बेटा हुआ। बहुत ख़ुशी की बात थी कि नवाब फैमिली में एक और नवाब आए। सो ट्विटर और फेसबुक समेत बॉलीवुड में बधाई गाई जाने लगीं और इंतज़ार होने लगा कि नाम क्या होगा। लेकिन सैफीना परिवार बेटा होने से पहले जितना फ़िल्म और क्रिकेट का था। बेटा होने के बाद उससे ज्यादा राजनीतिक हो गया। क्योंकि उन्होंने बेटे का नाम तैमूर रख दिया था। अब दुनिया के लिए तैमूर कुछ भी हो सकता था। लेकिन भारत के लिए वो एक लुटेरा था, जिसने भारत आकर मार-काट मचाते हुए लूटपाट की। इतना ही नहीं हत्या करने के बाद शवों की दीवार बना दी थी। ऐसे में लोगों ने नाम का खूब विरोध किया। फेसबुक और ट्विटर पर ट्रेंड करने लगा था कि नाम में क्या रखा है।

अब मुद्दे पर आते हैं। हालांकि मुद्दा वही है कि नाम में क्या रखा है। लेकिन अबकी बार नामकरण में गलती दुसरे पक्ष से हुई। तैमूर का जो लोग विरोध कर रहे थे। उस पक्ष कि सरकार यूपी में बनी तो सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने महिलाओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आनन-फानन में ऐंटी रोमियो स्क्वॉड का गठन कर दिया। सरकार ने कदम तो ठीक उठाया लेकिन अबकी बार सरकार नामकरण में चूक गयी। जी हाँ नामकरण में, क्योंकि शेक्सपिअर का 'रोमियो' दिल से प्यार करने वाला और जान देकर उसे निभाने वाले करेक्टर का नाम है।


पहले जानें रोमियो कौन है?
रोमियो शेक्सपियर की कहानी का वो किरदार है जिसकी माशूका थी जूलियट। यह एक ट्रैजिक लव स्‍टोरी है। जिसमें रोमियो एक राजकुमार और जूलियट एक राजकुमारी थी। जूलियट, रोमियो के पिता के दुश्‍मन की बेटी थी। रोमियो ने जब तक जूलियट से प्‍यार किया उसकी भनक किसी को लगने नहीं दी थी। कहानी का अंत कहता है कि रोमियो से शादी करने के लिए जूलियट ने नींद की दवा पीकर अपने घर वालों को धोखा देने की कोशिश की। ताकि वे उसे मृत समझकर मकबरा में डाल दें। लेकिन रोमियो को इसके बारे में कुछ नहीं पता था। उसने यही सोचा कि जूलियट सच में मर गई और रोमियो ने भी जहर पीकर जान दे दी जिससे कि वो भी मरने के बाद जूलियट के साथ रह सके लेकिन जब जूलियट को होश आने पर पता चला कि रोमियो मर चुका है तो फिर उसने भी खुद को मार डाला।

'मुंह मार मर्द' नहीं था रोमियो
अब जो लोग रोमियो को सच्चा प्यार करने वाला मानते हैं। उन्हें तो एंटी रोमियो स्कवॉड का नाम खटकना ही था। और खटकना भी चाहिए। क्योंकि न तो रोमियो कोई मनचला था और न ही कोई मुंह मार मर्द। वो तो जिससे प्यार करता था, उसके लिए जान देने वाला मर्द था। शेक्सपिअर की कहानी में कहीं ऐसा नहीं लिखा कि रोमियो जिस लड़की को देखता था बस उसके पीछे हो लेता था। तो फिर सरकार आपने काहे इस अभियान का नाम एंटी रोमियो स्कवॉड रख दिया आप कुछ और भी नाम रख सकते थे। जैसे मुहं मार मर्द.. या भटके हुए आशिक़ .. पीछा किया है तो पिटना पड़ेगा ... या फिर मजनू मारो दल ...
अभियान और बीजेपी को लगा झटका ...
योगी सरकार ने जिस उद्देश्य से एंटी रोमियो स्क्वॉड बनाई थी उसको बड़ा झटका तब लगा जब पुलिस ने सच ही सड़कों पर पार्कों में सिर्फ साथ चल रहे लड़के लड़कियों को पकड़ के पूछताछ कर डाली। हुआ यूँ की पुलिस ने सहमति से साथ जा रहे युवक युवतियों को भी निशाना बना लिया और कई जगह तो भाई बहन को भी नहीं छोड़ा। भाई-बहन होने का सबूत देने  के बाद ही उन्हें छोड़ा। ऐसे में मेसेज गया कि सरकार प्यार विरोधी है। वैसे भी बीजेपी पहले ही बदनाम थी वैलेंटाइन का विरोध करने के लिए। ऐसे में इस मामले ने एक बार फिर उस पर प्यार का विरोधी होने का ठप्पा लगा दिया।  
लेखक कहिन
हालांकि मेरे दिमाग की खुराफात कहती है सही में नाम में कुछ नहीं रखा। जो तैमूर का विरोध कर रहे थे वो भी एक अलग तरह की भावना के तहत कर रहे थे। और जो अब रोमियो का विरोध कर रहे हैं उनकी भी अपनी भावना है। हां पुलिस को जो ऑर्डर मिला है उसको सही तरीके से पालन करना चाहिए। वो क्या है यार ईस्ट दिल्ली में रहते हैं और अक्सर दोस्तों से मिलने ग़ाज़ियाबाद- नोएडा जाना होता है।

Thursday, December 8, 2016

दरवाजा खुला तो घर खाली था ...





#be in touch

कुछ सेकंड इंतज़ार कर दरवाज़े को धक्का दिया तो वो पहले ही खुला था ... वो दिसंबर की ठंडी शाम थी ... जल्दी दिन ढलता है इन दिनों .. कदम बढ़ाया तो अँधेरा था और कुछ कदम पर सीढियां .. जो दिख तो रही थीं .. लेकिन अजीब सी शांति थी जैसे वहां कोई हो ही न ... मैंने कदम वापस लिया और वापस गेट की तरफ बढ़ा .. कि अचानक अँधेरे में से किसी ने मेरी जैकेट पीछे से पकड़ी और मुझे लगभग खींचते हुए .. कहा कमीन रुक तो जा .. हाँ ठीक सुना कमीन .. हाँ ये गाली है .... लेकिन तब ये गाली नहीं थी ... (कमीन बोलने का हक़ उसने कमाया था) उसने अब जैकेट को पीछे से छोड़ कॉलर पकड़ते हुए कहा .. जा क्यों रहा था ... मैंने कहा क्योंकि घर में कोई नहीं है इसलिए .. (उसकी इतनी हिम्मत देखते ही समझ गया कि घर खाली है) उसने कहा कोई नहीं है तभी तो तुझे बुलाया है पागल .. मैंने बोला अच्छा और एक हाथ उसकी कमर में डालते हुए उसे अपनी ओर खींचा .. उसने कॉलर अब भी पकड़ा हुआ था ... वो बोली अच्छा ऊपर तो चल ... ऊपर पहुंचे तो रौशनी थी और घर सच में खाली था .. रौशनी में आते ही दिमाग काम करने लगा .. और शर्त याद आगयी .. मैंने बोला तूने शर्त पूरी नहीं की ... अब बोल क्या करेगी ... ??


अरे तू जो कहेगा वो करूँगी बस .. पर पहले जिस लिए बुलाया है वो सुन .. मैंने भी कहा हाँ बोल सुन रहा हूँ लेकिन अभी तक उसे छोड़ा नहीं था मेरे हाथ अब भी उसकी कमर पर थे.. बोली कमीन छोड़ तो बताती हूँ ... मामला सीरियस लगा ... तो इसे छोड़ा और दीवार से लग कर खड़ा हुआ और कहा बोल ... उसने कहा मम्मी से बात की थी ... कि तेरे यहां जाए बात करने पर वो टाल रहीं हैं बार - बार ... सुनती ही नहीं हैं मेरी बात ... मैंने कहा तूने ही ठीक से बात ही नहीं की होगी ... तो बोली यार हद है सब बता दिया उन्हें ... कि तू अच्छा दोस्त है .. वो खुद भी तेरी तारीफ करती हैं... तो अब क्या ये भी बताऊँ की तेरे साथ घूम रही हूँ आजकल ... फ़िल्म देख रही हूँ ... घर से झूठ और टीचर होके स्कूल से खुद ही बंक मार के तुझसे मिलने जाती हूँ ... कमीन कहीं का .. मैंने कहा अच्छा गुस्सा क्यों हो रही है तू कहे तो मैं बात करूँ ... ??? वो बोली ना जी स्वामी आप रहने दो ... आपने बात की तो ड्रामा ही हो जाना है घर में ... मैंने कहा फिर .. तो बोली सुन न .. मैं क्या सोच रही थी कि तू जयपुर या भोपाल जाने के लिए कह रहा था न जॉब के लिए .. एक काम कर मुझे भी ले चल ... मैं उसके पास गया हाथ से उसका मुंह खोला और सूंघते हुए बोला पापा वाली बोतल तूने चढ़ा ली क्या ... तुझे ले चलूं मज़ाक हो रहा है क्या ... तू एक बार ठीक से बात कर अपनी मम्मी से ... तो गुस्से में बोली अरे पागल है मेरी माँ .. वो सुनती ही नहीं है ... ले चल न किसी को पता भी नहीं चलेगा ... मैंने कहा तेरा दिमाग ख़राब है ... तो बोली अच्छा तेरा बड़ा सही है जब अपनी उस सहेली के साथ शिमला गया तब तेरा और उसका दिमाग सही था ... लेकिन मेरा ख़राब है ... कमीन सारी दुनिया के साथ घूमेगा बस मेरे साथ मौत आ रही है ...  यार समझा कर मेरी माँ न सुनेगी मेरी बात ... कोई तेरे घर भी न जायेगा ... तू मानता क्यों न है कमीन ... झुंझलाते हुए उसने कहा ... और फिर कॉलर पकड़ लिया ...

To be continued ... 

Wednesday, December 7, 2016

... और उसके घर की घंटी बजा दी



मोहल्ले की सबसे छोटी और तंग गली से निकलना मेरे लिए करीब 22 साल तक अजीब रहा ... सिर्फ काम के लिए ही मैं इस गली में आया जाया करता था ... लेकिन जो 23वां साल लगा ... तो मोहल्ले में घुसने के बाद ... घर तक जाने के लिए .. बाकी सारी गलियों को साँप सीढ़ी बनाते हुए उस गली से निकलने की जिद शुरू हुयी ...  
इतना ही नहीं गली में घुसने के साथ ही एक खिड़की पर नजर टिक जाती थी कि शायद वो दिख जाए। लेकिन ऐसा कभी होता नहीं था। उससे बात तो होती थीं, लेकिन उसे देखभर लेने की इच्छा उस गली में ले ही जाती थी।  ... फिर एकदिन फ़ोन पर बात करते हुए उसने कहा कि घर आजा .... और दिल्लगी देखिए कि घर से दो गली दूर होने ... गली वालों के तानों की बात और सारी सामाजिकता को रौंदते हुए कदम उसके घर की ओर बढ़ने लगे .. लेकिन फिर अचानक एक शर्त तय हुयी कि आऊंगा तभी जब तेरी मांग में सिन्दूर होगा ... और शर्त सिर्फ इतनी ही नहीं थी .. उसका अगला हिस्सा ये था कि अगर मांग में सिंदूर न हुआ तो मैं जो कहूंगा वो करना पड़ेगा। इसके बावजूद वो तैयार थी जबकि जानती थी कि मेरे कुछ भी का मतलब उसके लिये कई बार भारी पड़ चुका है।
वहीँ एक और बात जो मेरे दिमाग में साफ़ थी वो ये कि कोई भी लड़की शादी से पहले सिंदूर लगाने में झिझकेगी,,, चाहे वो गर्लफ्रेंड हो ... प्रेयसी हो या फिर मंगेतर ही क्यों न हो .... यह सोचते हुए मैंने उसके दरवाजे की घंटी बजा दी ...
to be continued ...

Wednesday, August 31, 2011

विज्ञापन के पीछे छोटे और बड़े होते आइडल


नमस्कार,
आमतौर पर लोग टीवी पर आने वाले विज्ञापनों पर ध्यान नहीं देते या किसी विशेष विज्ञापन या विशेष परस्थितियों में ही ध्यान दिया जाता हैं . जैसे की ऐश्वर्या राय का कोई नया विज्ञापन आने वाला हो, एसआरके या रणबीर कपूर का कोई नया पेप्सी वाला विज्ञापन हो, बिग बी आ जाये तो क्या बात है या फिर अक्षय कुमार का थम्सअप के लिए किया गया गया कोई जबरदस्त स्टंट हो तो लोग इन विज्ञापनों का इंतज़ार करते हैं. लेकिन अभी विज्ञापन जगत में कुछ नए सितारों ने भी कदम रखा है जो की एक अलग तरह के विज्ञापन करते आपको नज़र आयेंगे और उनके द्वारा किया विज्ञापन प्रभावकारी हो या न हो लेकिन उसके पीछे की सोच जरूर प्रभावकारी होती है ऐसा मुझे लगता है. हाँ इन विज्ञापनों में कोई तड़क भड़क नहीं होती लेकिन फिर भी ये एक अंतर को दर्शाते हैं एक सोच को दर्शाते हैं.
एक नज़र में देखते हैं की कैसे कुछ आइडल माने जाने वाले सितारे अपने प्रशंसकों को सही कामों के लिए प्रभावित नहीं करते, सबसे पहले एसआरके को लेते हैं जो की पेप्सी और अन्य कई विज्ञापनों में दिखते हैं अब उनका ये जिम्मा रणबीर कपूर ने ले लिया है इसके बाद अक्षय कुमार, इमरान खान और कई अन्य सितारे भी है जो ठन्डे से लेकर तेज़ रफ़्तार बाइक तक बेचते नज़र आ जायेंगे. तेज़ रफ़्तार बाइक बेचने वाले ये सितारे अपने प्रशंसकों से निवेदन भी करते हैं क़ी आप तेज़ रफ़्तार से बाइक न चलायें, अब भला ऐसा कैसे हो सकता है क़ी आप कुछ करें और आपके भक्त आपको भगवान् मानने वाले लोग तेज़ रफ़्तार बाइक न चलायें, दूसरा एसआरके जब एक विज्ञापन में कुछ बच्चों के साथ शहर क़ी सफाई करते नज़र आते हैं तो बड़ा अच्छा लगता है लेकिन बाद में पता चलता है क़ी वो तो किसी प्रतिष्ठित कम्पनी के लिए पेंट बेच रहें हैं ऐसे ही कई और उदाहरण मिल जायेंगे. हृतिक रोशन पाउडर और साबुन भी बेचेंगे तो बर्फ क़ी घाटियों में इधर उधर छलांग लगायेंगे, कच्छा और बनियान बेचना है तो भी तलवार चलाएंगे.. और हमारे क्रिकेट के खिलाडी तो और गज़ब है कभी सैफ अली खान के पीछे कई-कई मंजिल क़ी छत और दीवार कूद जाते है लेकिन मैदान पर अगर बाल रोकनी हो तो हाथ उठा कर पीछे वाले को इशारा कर देते हैं (यह इसलिए लिखा है क्योंकि भारतीय टीम क्षेत्ररक्षण में फिसड्डी है ये बात सब जानते हैं ) और इसमें मास्टर ब्लास्टर भी शामिल हैं तो लगता है क़ी जब ये कर रहे है तो बाकियों को क्यों दोष दें.

अब उन विज्ञापनों क़ी बात करते हैं जिसमे नए और कुछ पुराने आइडल हैं लेकिन विज्ञापन में जितनी जान है देखकर मज़ा आ जाता है इनमें आमिर खान का महिंद्रा न महिंद्रा की बाज़ार में आई नयी मोटरसाईकल का विज्ञापन जिसे देख कर दिल खुश हो जाता है जिसमें अंत में आमिर कहते हैं की मेरे द्वारा किये गए सब स्टंट आप भी कर सकते हैं ..एक और विज्ञापन में दिग्गज भारतीय बोक्स़र विजेंद्र सिंह रक्त दान का विज्ञापन करते नज़र आते है तो देख कर अच्छा लगता है.. एक और विज्ञापन जिसमें भारतीय पहलवान सुशील कुमार नहाने जाते हुए बाल्टी लेकर जाने की बात करते हैं क्योकि फव्वारे में नहाने से पानी ज्यादा बर्बाद होता है. और ये बात एकदम सर्वविदित है की अगला विश्वयुद्ध पेट्रो पदार्थो को लेकर हो या न हो लेकिन पानी को लेकर होना तय है.. एक और स्टार है विवेक ओबराय जो की टीबी के मरीजो को सरकारी अस्पताल जाने की सलाह देता है और दावा को उसके पूरे समय तक खाने की हिफ़=दयत देता नज़र आता है .. और हां आमिर खान वाला वो विज्ञापन जिसमे शाहरुख़ खान की तरह वो भी शहर की सफाई पर ध्यान दिलाते हैं लेकिन जब वो शहर की सफाई की बात करते हैं तो अतिथि देवो भाव के साथ भारतीय पर्यटन को बढ़ावा देने की बात करते है ..और कहते हैं की अगर सड़क पर गंदगी होगी, अगर हमारे पर्यटन स्थलों पर जहाँ तहां कूड़ा पड़ा होगा तो कोई क्यों और कैसे उनको देखने आएगा और हमारे देश में प्रेमी प्रेमिकाओं को और जगह मिले न मिले लेकिन एतिहासिक इमारतों पर अपना नाम लिख अमर हो जाने का विचार उनके दिमाग में खूब घर किये हुए है जैसे
पप्पू लव बसंती
चमेली लव पुत्तन
आई लव यू चंपा
मैं ये नहीं कहता कि ये लोग पैसा न लें,लेकिन इन्हें ये सोचना होगा कि पैसे के बदले ये समाज को देते क्या हैं??? आज हर चीज़ पर बाज़ार हावी है मैं ये खुद जानता हूँ. लेकिन जिन लोगों कि विज्ञापन के बाज़ार में मांग है उनकी कुछ जिम्मेदारी है अपने फैन्स के प्रति, समाज के प्रति, देश के प्रति.

Wednesday, August 17, 2011

और कितने आन्दोलन चाहती है सरकार

नमस्कार,
मुझे ऐसा लगता है कि २०१० और २०११ स्वतंत्रता के बाद के दो ऐसे सालों में दर्ज हो जायेंगे, जिनमें सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन और आन्दोलन हुए. २०१० से लेकर २०११ तक देश में कहीं न कहीं आंदोलनों या असफल आन्दोलनों का दौर जारी रहा है और अब भी जारी है. कुछ आन्दोलन थक कर बंद कर दिए गए तो कुछ को पुलिस ने दबा दिया कुछ के बारे में तो कहीं छपा तक भी नहीं तो कुछ इतने बड़े रहे क़ी उनके खर्चे पर ही सवाल उठा दिया गया. और इनकम टैक्स, कस्टम विभाग, पुलिस, सीबीआई और न जाने किन-किन विभागों को उनके पीछे लगा दिया गया.
लेकिन देखना यह है क़ी ये आन्दोलन या असफल आन्दोलन आखिर थे किस लिए..?? तो भैया ये थी आम आदमी क़ी जायज मांग- महंगाई कम कर दो, भ्रष्टाचार ख़त्म करना और भारत से बाहर जमा अवैध धन को वापस लाना. इन सारी मांगों पर हर कोई सहमत है क़ी ऐसा होना चाहिए. ऐसा मैं मानता हूँ. लेकिन अभी तक हुए आन्दोलनों में किसी को भी वह सफलता नहीं मिली जिसकी देश को जरूरत है.
ये आन्दोलनों या असफल आन्दोलनों का दौर बिलकुल वैसा ही है जैसा कि आज़ादी से पहले था जहां लगातार कोई न कोई पार्टी या संस्था प्रदर्शन या आन्दोलन कर रही होती थी. यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी आन्दोलनों को आम जनता का पूरा समर्थन मिल रहा है. लेकिन इस सब के बावजूद कमी कहाँ रह जाती है तो इसका कारण जो मुझे समझ आया वह भी आज़ादी के पहले वाले कारणों से मिलता जुलता ही है. इन आन्दोलनों के असफल होने के पीछे दो महत्वपूर्ण कारण दिखाई देते हैं
१) आन्दोलनों की एकता में कमी
२) सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति
१) आन्दोलनों की एकता में कमी
पिछले दो सालों में हुए असफल या अर्धसफल आन्दोलनों जिनमे महंगाई, भ्रष्टाचार, अवैध धन, तिरंगा यात्रा, कश्मीर विरोधी लोगों के खिलाफ आन्दोलन या अन्य कई मुद्दों पर हुए आन्दोलनों का अंजाम ..ज्यादा कुछ सफल नहीं रहा. और ये बिलकुल वैसा ही है जैसे आज़ादी से पहले लाहौर, कोलकाता, पंजाब, महाराष्ट्र, गुजरात और देश के अन्य अन्य हिस्सों से अलग-अलग आन्दोलन एक ही उद्देश्य आज़ादी के लिए चला रहे थे. बिलकुल वैसे ही आज बाबा रामदेव, अन्ना हजारे और अन्य संस्था और संगठन अपनी अपनी क्षमता के अनुसार भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ आन्दोलन चला रहे हैं..पर न जाने क्यूँ इन सबको एक छत के नीचे आने में क्या डर है इसका जवाब मुझे पता भी है और नहीं भी.. लेकिन यहाँ सिर्फ यह बताना चाहता हूँ कि यही कारण है की न आज़ादी से पहले के वो आन्दोलन सफल हुए थे और न आज वाले हो रहे हैं
२) सरकार की फूट डालो और राज करो की नीति
देश में इतने सारे आन्दोलनों का जनसमर्थन के बावजूद यूँ.. असफल हो जाना आम बात नहीं है इसके पीछे सरकार का पूरा हाथ है. जैसा मुझे लगता है. यहाँ भी आप देखेंगे कि आज की हमारी सरकार और आज़ादी से पहले की ब्रिटिश सरकार ने एक जैसे तरीकों से आन्दोलनों का दमन किया. इसमें सबसे पहला तरीका है फूट डालो और राज करो की नीति उन्होंने भी अपनाई थी और अपनी सरकार ने भी.. पहले सरकार ने बाबा रामदेव को छोटा करने के लिए अन्ना को बड़ा बनाया, उसके बाद बाबा रामदेव के पीछे आरएसएस का हाथ बता उनके आन्दोलन के साम्प्रदायिक होने का प्रचार कर डाला, इसके बाद सरकार ने राम लीला मैदान में रामदेव के साथ क्या किया वो सबको पता है. अब अन्ना का नंबर था अन्ना को बड़ा बनाने वाली सरकार खुद फंस गयी और अब अन्ना उनके संभाले में नहीं आये तो उनके पीछे भी आरएसएस का हाथ बता उनकी टीम को बदनाम करना शुरू कर दिया.
अभी तक सरकार ने हर तरह से आन्दोलनों को दबाने की कोशिश की लेकिन इस बार अन्ना अड़ गए हैं अटल हैं और उन्हें पूरा जनसमर्थन भी मिल रहा है आगे क्या होना है ये देश को तय करना है की फेसबुक और ट्विटर पर लायिक कर समथन देना है या सड़क पर उतर कर समर्थन को जरुरत पड़ने पर क्रांति में बदलना है ??

Friday, May 20, 2011

इंजेक्शन है चक्काजाम

एक आदमी को खांसी हो जाती है तीन-चार दिनों तक ठीक नहीं होती तो वह आदमी जाता है डॉ. के पास
और दवाई ले आता है डॉ. कहता है इन्फेक्शन है इंजेक्शन लगाना पड़ेगा आदमी कहता है ठीक है डॉ.
इंजेक्शन लगा देता है और वह आदमी दो दिन में ठीक हो जाता है. सोचो अगर वह आदमी डॉ. के पास
नहीं जाता और इंजेक्शन नहीं लगवाता तो क्या होता...??? होता ये की वो खांसी धीरे-धीरे टीबी हो
जाती और फिर उस आदमी को है से था बना देती.

अब असल मुद्दे पर आते हैं जिसके लिए यह लेख लिखना शुरू किया था. अर्थात ये की अगर मैं बीजेपी द्वारा पेट्रोल
और दूध के दाम बढ़ाये जाने के विरोध में किये गए चक्का जाम को इंजेक्शन कहूँ तो गलत नहीं होगा. क्योंकि पिछले एक डेढ़ साल में जिस तरह से दूध और पेट्रोल के दाम बढ़े हैं वो चिंता का विषय है. सही बताऊँ तो दूध का तो कुछ ऐसा है की कुछ लोग अगर न भी पीएं तो चलता है लेकिन ऐसे भी लोग हैं जिन्हें बिना दूध पीये नींद ही नहीं आती, और साहब दूसरों का क्या कहूँ मुझे खुद भी नहीं आती. दूसरी और पेट्रोल है तो भैया इसकी माया तो ऐसी है की अगर ये महंगा होता है तो भैया निश्चित तौर पर खाने-पीने की हर चीज़ का महंगा होना तय है. क्योंकि पेट्रोल की वजह से आयात निर्यात, यातायात और आवाजाही के शुल्क में तेज़ी से वृद्धि होगी. जिसका असर फल-सब्जियों और आदि वस्तुओं पर पड़ना तय है और अप्रत्यक्ष रूप से महंगाई का का ग्राफ ऊपर जाना निश्चित.

अब इन्ही पेट्रोल और दूध के दामों में हुई बढ़ोतरी को वापस लेने के लिए बीजेपी ने चक्का जाम किया, दिल्ली स्तर
के इस चक्का जाम में बीजेपी काफी हद तक सफल भी रही. और ये सब किया किसके लिए जनता के लिए क्योंकि
अंततः भला या बुरा जो भी होगा वो तो जनता का ही होगा. हाँ यह अलग बात है कि, और मैं इससे इनकार भी नहीं करूँगा की इस जनता की भलाई में राजनितिक फायदा भाजपा का है. तो इसमें भी क्या गलत है भाजपा लोकसभा में विपक्ष की भूमिका में भी तो है. तो इन मुद्दों पर धरना प्रदर्शन करना तो बनता ही है.

लेकिन मुझे आश्चर्य तब हुआ जब टीवी पर देखा की चक्का जाम के दौरान जो लोग जाम में फंसे थे वे कह रहे थे
की यह ठीक है की जनता पेट्रोल और दूध के दाम बढ़ने से परेशान है लेकिन इस चक्का जाम से भी तो आम जनता ही परेशान हो रही है. दूसरी तरफ टीवी पर जो रिपोर्टर साहब थे वो कह रहे थे की एक विरोध पिछले दिनों अन्ना हजारे ने किया था जिससे किसी को कोई दिक्कत नहीं हुई और एक विरोध ये है. तो मैं कहूँगा की अन्ना जी ईमानदार व्यक्ति हैं मैं उनका सम्मान भी करता हूँ लेकिन उनके अनशन से क्या फायदा हुआ मुझे अभी तक नज़र नहीं आया. जो कमेटी गठित की गयी है उसमे दो अध्यक्ष हैं, लोकपाल बिल भी जस का तस पास हो जायेगा मुझे इस पर १००% शक है.

हो सकता है अन्ना जी के अनशन का दूरगामी फायदा हो लेकिन यदि हम उस प्रक्रिया को दूध और
पेट्रोल की कीमतों को कम करने पर भी अपनाएँ तो ६ महीने कमेटी के गठन में, ६ महीने बहस में और
६ माह पेट्रोल और दूध के दामों के मूल्य निर्धारण में लगेंगे और तब तक जो महंगाई नहीं झेल पाया
वो मर जायेगा और जो झेल पायेगा उसे इसकी आदत पड़ जायेगी और दाम फिर बढ़ा दिए जायेंगे.
और इस प्रकार ये खांसी धीरे-धीरे टीबी बन हम सबको खा जायेगी. अब विचार आप कीजिये की अच्छा क्या है
इंजेक्शन या टीबी ????

Wednesday, April 27, 2011

कॉलमों में बंटा पत्रकार (प्रिंट)

नमस्कार,

समाचार पत्र में काम करने वाले व्यक्ति की मानसिकता और उसकी सोच धीरे-धीरे उसे प्रत्येक घटना और ऐसा कोई भी घटना क्रम जो एक प्रिंट पत्रकार के सामने घटित होता है उसे लेकर प्रिंट मीडिया में काम करने वाले व्यक्ति का अपना एक नजरिया विकसित होता है या होता चला जाता है
फिर वह प्रिंट पत्रकार आम व्यक्ति नहीं रहता वह मशीन हो जाता है कुछ हद तक, जो किसी भी खबर या घटनाक्रम को अखबार या मैगजीन छापने के लिए उसका आंकलन भावनात्मक रूप में करना छोड़ देते हैं. ऐसा तब ज्यादा होता है जब उस पत्रकार को लगभग पिछले डेढ़ महीने से छुट्टी नहीं मिली हो, नए एडिसन लॉन्च करने के चक्कर में चार वीक ऑफ़ भी नहीं मिलें हो. यहाँ तक की आपके पेज का समय १२ की जगह १:३० हो गया हो और छोड़ते छोड़ते २ बजे और घर पहुँचते-पहुँचते तीन. तो ऐसा ज्यादा जल्दी होता है और आपका जीवन अखबारमय होने लगता है. ऐसा इसलिए भी हो सकता है की आप अपने काम के साथ ही एन्जॉय करने की कोशिश करने लगते हैं जिससे छुट्टी न मिलने पर काम बोझ न बने.
अब आप देखिये की किन ख़बरों और घटनाक्रमों को किस मानसिकता से लिया जाता है दो बहुत ताज़ा और बहुत छोटे उदाहरण देता हूँ :-
१) रात के २:४५ कैब से घर जाते समय अक्षरधाम मंदिर के सामने कंटेनर ट्रक पलटा हुआ देखा तो अनायास ही कैब में आगे की शीट पर बैठे सर के मुंह से निकला की अरे फोटो खींच लो और फिर अगली लाइन मेरी थी की लो एक और "सिंगल कॉलम" और अगर समय दिन का होता तो शायद "डीसी" (डबल कॉलम) या "टीसी" (तीन कॉलम) होती क्योंकि फिर खबर के साथ पलटे हुए कंटेनर के पीछे लगे जाम का फोटो भी होता.

२) सत्य साईं बाबा की मृत्यु के बाद अखबार ने एक पूरा पेज बाबा को समर्पित किया. तो ऑफिस में बैठे बात करते हुए अचानक ख्याल आया की जब बाबा की तबियत ख़राब हुई उस दिन बाबा सिंगल कॉलम थे, तबीयत थोड़ी बिगड़ी तो डीसी और टीसी हो गए वो भी फोटो के साथ और अपने अंत के साथ अंततः बाबा पूरा पेज हो गए. तो भाई लोगों इसे कहते हैं
"जिन्दा हाथी लाख का
मरा सवा लाख का
"

अखबार का ऑफिस एक अजीब जगह होती है जहाँ ख़बरों के चक्कर में अक्सर ऐसा होता है, आप ही बताएं आपको कैसा लगेगा अगर आपको को सुनने को मिले की बस खाई में गिर गयी है और इस हादसे में ४ बच्चों सहित १० लोगों की जान चली गयी. आपके लिए ये एक दुखद घटना है और सामान्य रूप से पत्रकार के लिए भी लेकिन जब पत्रकार ऑफिस में होता है तो इसी खबर को कहता है की "एक बड़ी और अच्छी खबर आई है लीड बनाओ" और जानते हैं यह सब कब होता है यह तब होता है जब आधी दुनिया सो रही होती है और पत्रकार अखबार छापने क़ी आपाधापी और ढेर ख़बरों में से ख़बरों के चयन में लगा होता है अन्दर ऑफिस की जगमगाती लाइटों के बीच उसे याद भी नहीं होता की दिन नहीं रात है.

टूटता है कॉलम
लेकिन इस सब के बाद भी पत्रकार, इंसान ही रहता है और कई बार ऐसा कुछ हो जाता है की कॉलमों में बंटा पत्रकार अचानक इंसान हो जाता है और उसे भावना और दर्द दोनों चीज़ों का अर्थ समझ आ जाता है छोटा सा उदाहरण :-
पिछले दिनों धौलाकुआँ स्थित दक्षिण परिसर के कॉलेज रामलाल आनंद की एक छात्रा की गोली मार कर हत्या कर दी गयी,.. मैंने भी उसी कॉलेज से पढ़ाई की है तो उस लड़की को जनता भर था,.. या कहूँ की उस लड़की से मौकापरस्त दोस्ती थी मतलब काम की दोस्ती वो भी सिर्फ इस लिए की मेरा दोस्त चुनाव लड़ रहा था तो वोट लेने के चक्कर में सबसे बात करनी होती थी.. जिनमें वो लड़की "राधिका" भी थी लेकिन उस लड़की की हत्या की खबर जब मुझे ही पढ़ने को मिली और मेरे ही पेज पर मैंने ही लगायी, तो न जाने दिमाग में क्या चल रहा था.. मुझे ठीक से याद भी नहीं, पर कुछ था जरूर जिसने करीब उस पूरी रात तो मुझे बेचैन रखा..अन्दर कहीं उसका चेहरा और उसकी मुझसे दो साल कम उम्र कहीं न कहीं घूमती ही रही.. दिमाग कॉलमों में तो उस दिन भी बंटा लेकिन एक अजीब सी कशमकश साथ थी..

मैंने ऊपर सत्य साईं बाबा के निधन का पर जो कमेन्ट किया है यदि उस से किसी को दुःख हुआ है तो क्षमा प्रार्थी हूँ , शायद में ऐसा इसलिए लिख पाया क़ी में भी एक पत्रकार बनने क़ी प्रक्रिया में आगे बढ़ रहा हूँ